Rajbhasha Smart Search


Sort :
Loading...
Go to Page :

Jun 3, 2026

त्रैलंग स्वामी - शिव के अवतार की जीवनी - परिशिष्ट 4: शब्दावली (Glossary)

 अद्वैत वेदांत का प्रमुख सिद्धांत, जिसके अनुसार आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। उल्लेख: अध्याय 5, स्वामीजी की आध्यात्मिक दृष्टि।

आसन योग की स्थिर और सुखद स्थिति, ध्यान व प्राणायाम के लिए शरीर को तैयार करने का अभ्यास। उल्लेख: अध्याय 4, वाराणसी में ध्यान-आसन।

आत्मज्ञान आत्मा के स्वरूप और उसके परमात्मा से एकत्व का बोध। उल्लेख: अध्याय 6, स्वामीजी का मौन तप।

आवधूत वह उच्चकोटि का योगी जो समाज के नियमों, बाहरी आडंबरों और सांसारिक बंधनों से पूर्णतः मुक्त होता है। अवधूत शरीर, मन और आत्मा की सीमाओं से परे जाकर शुद्ध चेतना में स्थित होता है। उल्लेख: अध्याय 7, स्वामीजी के जीवन-आदर्श।

काशी उत्तर प्रदेश का वाराणसी नगर, मोक्षधाम के रूप में प्रसिद्ध। स्वामीजी का अधिकांश जीवन यहीं बीता। उल्लेख: अध्याय 3

गुरु आध्यात्मिक मार्गदर्शक जो शिष्य को ज्ञान और साधना की दिशा देता है। उल्लेख: अध्याय 2, गुरु-शिष्य परंपरा।

तंत्र साधना, मंत्र, यंत्र, ध्यान और विशेष अनुष्ठानों का रहस्यमय और गूढ़ विद्याओं का समुच्चय, जो साधक की आध्यात्मिक शक्ति जाग्रत करने में सहायक होता है। उल्लेख: अध्याय 5 और परिशिष्ट 4

ध्यान मन को एकाग्र कर परमात्मा में लीन होने की साधना। उल्लेख: अध्याय 4, स्वामीजी का ध्यान-साधना।

प्राणायाम श्वास नियंत्रण के अभ्यास द्वारा प्राण-शक्ति का संचय और शुद्धि। उल्लेख: अध्याय 5, योगिक अनुशासन।

भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव। उल्लेख: अध्याय 6, उपदेशों में भक्ति का महत्व।

मणिकर्णिका घाट गंगा तट पर वाराणसी का प्रमुख घाट, ध्यान और प्रवचन के लिए प्रसिद्ध। उल्लेख: अध्याय 3

मोक्ष जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की अवस्था। उल्लेख: अध्याय 6, स्वामीजी के उपदेश।

वैराग्य संसारिक इच्छाओं और मोह से विमुख होकर आत्मिक मुक्ति की ओर बढ़ना। उल्लेख: अध्याय 1

वेदांत उपनिषदों पर आधारित भारतीय दर्शन का प्रमुख मत। उल्लेख: अध्याय 5, स्वामीजी की साधना।

योगसूत्र पतंजलि द्वारा रचित योग दर्शन का मूल ग्रंथ। उल्लेख: अध्याय 4, योगिक जीवन।

लोकश्रुति लोकमान्यताओं और कथाओं पर आधारित परंपरागत आख्यान। उल्लेख: अध्याय 1 और 7, चमत्कार प्रसंग।

साधना नियमित और अनुशासित आध्यात्मिक अभ्यास, जो आत्म-विकास, आंतरिक शुद्धि और ईश्वर की अनुभूति के लिए किया जाता है। इसमें ध्यान, मंत्र-जप, योग, उपवास या गुरु-निर्देश पर आधारित अनुष्ठान शामिल हो सकते हैं। उल्लेख: परिशिष्ट 4 और अध्याय 4

समाधि ध्यान की चरम अवस्था, जहाँ साधक की चेतना पूर्णतः आत्मा या ब्रह्म के साथ एकीकृत हो जाती है। यह योग की अंतिम अवस्था है। उल्लेख: परिशिष्ट 4 और अध्याय 5

शिवत्व शिव के गुणों (परम शांति, जागरूकता, निःस्वार्थता) को अपने भीतर अनुभव करना और जीवन में धारण करना। उल्लेख: परिशिष्ट 4 और अध्याय 6

सिद्धि योग या साधना से प्राप्त विशेष आध्यात्मिक शक्ति। उल्लेख: अध्याय 7, स्वामीजी के चमत्कार।

घाट नदी किनारे बने पक्के सीढ़ीनुमा स्थल। उल्लेख: अध्याय 3, वाराणसी के घाट।

उपनिषद वेदों के अंतर्गत आने वाले दार्शनिक ग्रंथ, आत्मा और ब्रह्म के ज्ञान का स्रोत। उल्लेख: अध्याय 5

No comments: