मनुष्य की सबसे गहरी उलझन यह नहीं है कि उसे क्या करना चाहिए, बल्कि यह है कि वह जो कर रहा है, उसे किस अवस्था में कर रहा है। बाहर से देखने पर दो लोगों का जीवन लगभग समान हो सकता है—एक ही परिवार, एक जैसा काम, समान जिम्मेदारियाँ—फिर भी एक व्यक्ति भीतर से शांत, संतुलित और अर्थ से भरा हुआ लगता है, जबकि दूसरा लगातार थका हुआ, चिड़चिड़ा और असंतोष से घिरा रहता है। यह अंतर परिस्थितियों का नहीं, बल्कि उस आंतरिक स्थिति का है जिसमें कर्म किया जा रहा है।
आधुनिक जीवन में कर्म से बचना लगभग असंभव है। काम, संबंध, समाज, तकनीक—हर दिशा से हम कुछ न कुछ करते रहने को बाध्य हैं। ऐसे में प्रश्न यह नहीं रह जाता कि कर्म करें या न करें, बल्कि यह बन जाता है कि कर्म हमें बाँध रहा है या मुक्त कर रहा है। यहीं से योग और कर्म का संबंध सामने आता है—एक ऐसा संबंध, जिसे अक्सर गलत समझा गया है, या फिर केवल धार्मिक या पारंपरिक दायरों में सीमित कर दिया गया है।