ब्रह्माण्ड की प्रथम ध्वनि का अनन्त विज्ञान
"ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्।"
— माण्डूक्य उपनिषद्
यदि संसार के समस्त धर्मग्रंथों, दर्शनशास्त्रों और आध्यात्मिक परम्पराओं से केवल एक ही ध्वनि को चुनना हो जो सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करती हो, तो भारतीय ऋषि निस्संदेह "ॐ" का चयन करेंगे।
ॐ कोई साधारण शब्द नहीं है। यह किसी एक धर्म, सम्प्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। यह न तो केवल हिन्दुओं का प्रतीक है और न ही केवल योगियों का मंत्र। भारतीय ऋषियों ने इसे सृष्टि की मूल ध्वनि, ब्रह्म का प्रतीक, समस्त वेदों का सार, और आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा का सेतु कहा है।
हजारों वर्षों से हिमालय की गुफाओं में तप करते ऋषि, वेदों का गायन करते ब्रह्मचारी, उपनिषदों का चिंतन करते मुनि, योगी, संन्यासी और आधुनिक संत—सभी एक स्वर में कहते आए हैं कि यदि सम्पूर्ण वेदों के ज्ञान को एक अक्षर में समेटना हो, तो वह अक्षर ॐ है।
किन्तु प्रश्न यह है—
क्या ॐ केवल "ओम" बोल देने का नाम है?
क्या यह केवल ध्यान आरम्भ करने का मंत्र है?
क्या यह केवल धार्मिक प्रतीक है?
या वास्तव में यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का रहस्य अपने भीतर समेटे हुए है?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें आधुनिक कल्पनाओं से नहीं, बल्कि उन ऋषियों के पास जाना होगा जिन्होंने इस ध्वनि का प्रत्यक्ष अनुभव किया।
"ॐ" शब्द की व्युत्पत्ति
संस्कृत में इसे प्रणव, ओंकार, एकाक्षर, तारक, उद्गीथ आदि अनेक नामों से संबोधित किया गया है।
1. प्रणव
"प्र" का अर्थ है – उत्कृष्ट, आगे, विशेष।
"नव" धातु का अर्थ है – स्तुति करना, नमन करना या नई चेतना की ओर ले जाना।
इस प्रकार प्रणव वह है जो साधक को परम सत्य की ओर ले जाए।
कुछ आचार्य इसकी व्याख्या इस प्रकार भी करते हैं—
"प्रकर्षेण नयति इति प्रणवः।"
अर्थात् जो साधक को उत्कृष्ट रूप से ब्रह्म की ओर ले जाए वही प्रणव है।
2. ओंकार
"ओं" + "कार"
अर्थात वह ध्वनि जिससे सम्पूर्ण सृष्टि का उच्चारण हुआ। यह केवल अक्षर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ध्वनि-सृष्टि का मूल बीज है।
3. एकाक्षर
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म।"
यहाँ "एकाक्षर" का अर्थ केवल एक वर्ण नहीं है। बल्कि ऐसा अक्षर जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ हो।
क्या ॐ किसी मनुष्य ने बनाया?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। भारतीय दर्शन कहता है—
नहीं।
ऋषियों ने ॐ की रचना नहीं की। उन्होंने उसका अनुभव किया।
इसी कारण वेदों को अपौरुषेय कहा गया। अर्थात् वे किसी मनुष्य द्वारा लिखे नहीं गए। ऋषि उनके लेखक नहीं हैं। वे केवल द्रष्टा (Seers) हैं।
उन्होंने समाधि में उस दिव्य नाद को सुना जिसे बाद में "प्रणव" कहा गया।
नाद से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
भारतीय दर्शन का एक अत्यन्त गम्भीर सिद्धान्त है—
सृष्टि ध्वनि से उत्पन्न हुई।
आज आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ऊर्जा और कम्पनों (Vibrations) का स्वरूप है। ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा—
सबसे पहले नाद था।
उस नाद से स्पन्दन हुआ।
स्पन्दन से आकाश।
आकाश से वायु।
वायु से अग्नि।
अग्नि से जल।
जल से पृथ्वी।
यह केवल दार्शनिक कल्पना नहीं है, बल्कि भारतीय तत्त्वमीमांसा का आधार है।
वेदों में ॐ
बहुत लोग सोचते हैं कि ॐ केवल उपनिषदों में मिलता है।
यह आधा सत्य है। वास्तव में सम्पूर्ण वैदिक परम्परा का प्रत्येक यज्ञ, प्रत्येक मंत्र और प्रत्येक स्वाध्याय ॐ से जुड़ा हुआ है।
वेदों में ॐ को कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष और कभी उद्गीथ के रूप में समझाया गया है।
ऋग्वैदिक परम्परा
ऋग्वेद मुख्यतः स्तुतियों का वेद है।
यद्यपि वर्तमान संहिताओं में "ॐ" का स्वतंत्र वर्णन कम दिखाई देता है, किन्तु ऋषियों की मौखिक परम्परा में प्रत्येक ऋचा का आरम्भ प्रणव से माना गया।
बाद के ब्राह्मण ग्रंथ स्पष्ट करते हैं कि बिना प्रणव के वैदिक पाठ अधूरा माना जाता था।
यजुर्वेद
यजुर्वेद में यज्ञ केवल अग्नि में आहुति डालना नहीं है।
यज्ञ का वास्तविक उद्देश्य— जीव और ब्रह्म का मिलन।
यही कारण है कि यज्ञारम्भ में प्रणव का उच्चारण अनिवार्य माना गया।
क्यों?
क्योंकि प्रणव सम्पूर्ण देवताओं का सार है।
सामवेद
यदि कोई वेद संगीत है—
तो वह सामवेद है।
और यदि संगीत का मूल स्वर है—
तो वह ॐ है।
सामगान में "उद्गीथ" का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
उपनिषद आगे चलकर बताते हैं कि यही उद्गीथ वास्तव में प्रणव है।
अर्थात् सम्पूर्ण वैदिक संगीत उसी मूल ध्वनि का विस्तार है।
अथर्ववेद
अथर्ववेद आध्यात्मिक साधना, चिकित्सा, मनोविज्ञान और आन्तरिक शक्ति का वेद है।
इस परम्परा में ॐ को ध्यान, तप, जप और आत्मानुभूति का बीज माना गया।
उपनिषदों में ॐ का महात्म्य
यदि वेद बीज हैं—
तो उपनिषद उनके फल हैं।
और यदि उपनिषदों का हृदय खोजा जाए—
तो वहाँ केवल एक ही ध्वनि बार-बार सुनाई देती है—
ॐ।
छान्दोग्य उपनिषद
यहाँ पहली बार "उद्गीथ" की विस्तृत व्याख्या मिलती है।
ऋषि कहते हैं—
जिस प्रकार वृक्ष का सार रस है,
रस का सार अन्न,
अन्न का सार मनुष्य,
मनुष्य का सार वाणी,
वाणी का सार ऋचा,
ऋचा का सार साम,
और साम का सार—
उद्गीथ अर्थात् ॐ।
यह अत्यन्त अद्भुत दर्शन है।
ऋषि कह रहे हैं—
जैसे दूध का सार घी है,
वैसे ही सम्पूर्ण वेदों का सार ॐ है।
प्रश्न उपनिषद
यहाँ छह शिष्यों ने महान ऋषि पिप्पलाद से प्रश्न पूछे।
उनमें से एक प्रश्न था—
जो मनुष्य जीवनभर ॐ का ध्यान करता है—
उसे क्या प्राप्त होता है?
ऋषि उत्तर देते हैं—
यदि कोई केवल एक मात्रा का ध्यान करता है—
तो उसे सीमित फल मिलता है।
यदि दो मात्राओं का ध्यान करता है—
तो उच्च लोक प्राप्त होते हैं।
यदि सम्पूर्ण प्रणव का ध्यान करता है—
तो वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
यहाँ पहली बार स्पष्ट बताया गया कि केवल उच्चारण पर्याप्त नहीं है।
सही ज्ञान के साथ किया गया प्रणव-ध्यान ही मुक्ति का साधन है।
कठोपनिषद
नचिकेता और यमराज का संवाद भारतीय दर्शन का अमूल्य रत्न है।
यमराज कहते हैं—
जिस पद को पाने के लिए वेदों का अध्ययन किया जाता है,
जिसके लिए तपस्या की जाती है,
जिसके लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है—
वह पद मैं संक्षेप में बताता हूँ—
वह है ॐ।
कल्पना कीजिए।
जिस सत्य को पाने के लिए सम्पूर्ण वेद हैं—
यमराज उसे एक अक्षर में समेट देते हैं।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में ॐ को "वेदों का सार" कहा गया।
माण्डूक्य उपनिषद – प्रणव का शिखर
यदि केवल एक उपनिषद चुनना हो जो सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त का सार हो—
तो वह माण्डूक्य उपनिषद है।
यह आकार में सबसे छोटा है।
केवल बारह मंत्र।
किन्तु आदि शंकराचार्य कहते हैं—
केवल यह उपनिषद ही मुक्ति के लिए पर्याप्त है।
पहला मंत्र कहता है—
"ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्।"
अर्थात—
यह सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत ॐ ही है।
जो था,
जो है,
जो होगा,
और जो समय से परे है—
वह भी ॐ है।
यहाँ ॐ किसी धार्मिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व की अंतिम वास्तविकता के रूप में स्थापित किया गया है।
अब तक हमने देखा कि ॐ केवल एक मंत्र नहीं है। यह भारतीय आध्यात्मिक परम्परा की आधारशिला है। वेद इसे यज्ञ का प्राण मानते हैं, उपनिषद इसे ब्रह्म का प्रतीक कहते हैं, और ऋषि इसे उस दिव्य नाद के रूप में अनुभव करते हैं जिससे समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ।
लेकिन यह तो केवल आरम्भ है।
भाग–2 में हम विस्तार से समझेंगे—
"अ–उ–म्" का वास्तविक रहस्य
माण्डूक्य उपनिषद की चार चेतना अवस्थाएँ
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा प्रणव का रहस्य
शिवपुराण, लिंगपुराण और भागवत में ॐ
आदि शंकराचार्य, गौड़पाद और आधुनिक संतों की गहन व्याख्या
तथा यह कि साधक के जीवन में ॐ का अनुभव कैसे प्रकट होता है।
यह यात्रा केवल ज्ञान की नहीं, बल्कि आत्म-अनुभूति की ओर बढ़ने वाली यात्रा है।