राघव गंगा के घाट की सीढ़ियों पर बैठा था।
आरती का दिव्य अनुभव अभी भी उसकी
आँखों में तैर रहा था।
दीपों का सागर, मंत्रों की गूंज और भीतर की रोशनी… सब कुछ उसकी
आत्मा को हिला चुके थे।
लेकिन उसके दिल में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—
“यह जो मैंने अनुभव किया, क्या यह स्थायी है?
या यह भी क्षणिक है?”
वही वृद्ध साधु उसके सामने प्रकट हुए।
उनकी आँखों में इस बार कठोरता नहीं,
बल्कि गहरी गंभीरता थी।
वे बोले—
“बाबा, तूने दीपों में आत्मा की झलक देखी।
लेकिन चौथा द्वार झलक नहीं, सत्य है।
उहे क्षणिक नहीं, शाश्वत बा।”
राघव ने काँपते स्वर में पूछा—
“महाराज, मैं उस शाश्वत को कैसे पा सकता हूँ?”
साधु ने शांत स्वर में कहा—
“चौथा द्वार तोहरे भीतर बा।
उ ना गंगा में बा, ना दीप में, ना भीड़ में।
तोहरा भीतर जब सब कुछ मिट जाई—भय,
मोह, अहंकार और यहाँ तक कि साधक होने का भाव भी—तबे चौथा
द्वार खुली।”
उस रात राघव ने ध्यान लगाया।
गंगा किनारे चाँदनी बिखरी थी।
वह सीढ़ियों पर बैठा और आँखें बंद कर
लीं।
धीरे-धीरे उसकी सांसें स्थिर हुईं।
उसने भीतर देखा— भय अब नहीं था,
मोह टूट चुका था, अहंकार विलीन हो चुका था।
लेकिन एक और परत बची थी—“मैं साधक हूँ” की भावना।
वह सोच रहा था— “जब तक मैं
खुद को साधक मानता हूँ, तब तक
मैं कोई न कोई पहचान से बँधा हूँ।
और पहचान ही तो बंधन है।”
उसने धीरे-धीरे इस पहचान को भी छोड़ने की कोशिश की।
जैसे किसी ने आख़िरी कपड़ा भी उतार
दिया हो।
अचानक उसके सामने वही आकृति आई।
लेकिन इस बार आकृति डरावनी, मोहक या राजसी नहीं थी।
वह बिल्कुल उसकी अपनी ही प्रतिछाया
थी।
प्रतिछाया बोली—
“मैं ही तू हूँ।
मैं ही वह साधक हूँ जिसने तीन द्वार
पार किए।
अगर तू मुझे छोड़ देगा तो तू कौन
रहेगा?
कुछ भी नहीं!”
राघव काँप उठा।
उसके भीतर डर उठा—
“अगर मैं यह ‘साधक’ वाली पहचान भी
छोड़ दूँ, तो मैं क्या बनूँगा?
क्या मैं शून्य हो जाऊँगा?”
प्रतिछाया हँसी—
“हाँ! तू शून्य हो जाएगा।
और शून्य से बड़ा डर कोई नहीं।”
राघव ने साहस जुटाया।
उसने कहा— “अगर शून्य ही सत्य है, तो मैं शून्य को स्वीकार करता हूँ।”
जैसे ही उसने यह कहा, उसकी
प्रति छाया धुएँ में बदल गई।
उसके सामने एक विशाल द्वार प्रकट हुआ।
यह द्वार किसी सोने-चाँदी का नहीं
था—यह शुद्ध प्रकाश से बना था।
इतना उज्ज्वल कि आँखें झेल नहीं पा
रही थीं।
द्वार पर लिखा था—
“जब सब कुछ मिट जाए,
तभी आत्मा प्रकट होती है।”
राघव ने काँपते हाथों से द्वार खोला।
भीतर से प्रकाश की ऐसी बाढ़ आई कि वह
उसमें डूब गया।
यह प्रकाश बाहर का नहीं, भीतर का था।
उसे लगा जैसे उसका शरीर गायब हो गया है।
वह गंगा की लहरें है, वह दीप है, वह आकाश है, वह धरती है।
उसने अनुभव किया— “मैं और ब्रह्मांड अलग नहीं।
मैं ही आत्मा हूँ, मैं ही प्रकाश हूँ।”
उस क्षण उसे लगा कि वह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे पहुँच गया है।
न कोई भय, न मोह, न अहंकार—सिर्फ़ शांति और प्रेम।
जब उसने आँखें खोलीं, तो
साधु उसके सामने खड़े थे।
उनके चेहरे पर करुणा और गर्व था।
वे बोले— “बाबा, तूने चौथा द्वार पार कर लिहलऽ।
अब तोहरे भीतर आत्मा का प्रकाश जागल
बा।
याद रखऽ—ई अनुभव के अपना तक मत राखऽ।
ई रोशनी दूसरों तक बाँटऽ, तभिए ई पूरा होई।”
राघव ने उनके चरण छुए।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे,
लेकिन यह आँसू दुख के नहीं, अपार आनंद के थे।
गंगा किनारे चाँदनी बिखरी थी।
दीप बुझ चुके थे, लेकिन राघव के भीतर का दीप जल उठा था—अनंत,
शाश्वत।
उसने मन ही मन कहा— “अब
मैं जानता हूँ—मुक्ति कोई दूर की चीज़ नहीं, यह तो भीतर ही है।
बस परतें हटानी होती हैं।”
चारों द्वार पार हो चुके थे।
लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं थी।
अब एक नया अध्याय शुरू होना था—करुणा
और सेवा का मार्ग।
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