शाम का समय था।
सूरज धीरे-धीरे पश्चिम में ढल रहा था
और गंगा का जल सुनहरी चादर की तरह चमक रहा था।
राघव तीसरा द्वार पार करने के बाद
पहली बार घाट पर बिना बोझ के बैठा था।
उसके चेहरे पर एक अलग शांति थी।
भीड़ जुटने लगी थी।
आज विशेष अवसर था—महाआरती।
सैकड़ों लोग घाट पर जमा हो गए।
कहीं से ढोल-नगाड़े बजने लगे, कहीं से शंखनाद गूँज उठा।
राघव ने चारों ओर देखा।
हर किसी के चेहरे पर उत्साह था।
कोई दीपक लिए बैठा था, कोई फूल चढ़ाने की तैयारी कर रहा था।
गंगा के दोनों किनारे मानो रोशनी के
लिए तैयार हो रहे थे।
अचानक पाँचों पुजारी सफेद और पीत वस्त्र पहनकर घाट की सीढ़ियों पर आ खड़े हुए।
उनके हाथों में बड़े-बड़े पीतल के दीप
थे।
ढोल और शंख की ध्वनि तेज़ हो गई।
एक साथ हजारों दीप प्रज्वलित हुए।
गंगा की लहरें दीपों की लौ को अपने जल में प्रतिबिंबित करने लगीं।
पूरा वातावरण सुनहरी आभा में नहा गया।
हवा में गूँज रहा था—
“ॐ नमः शिवाय… हर हर गंगे…”
राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह इस दृश्य में खो गया।
यह केवल एक अनुष्ठान नहीं था, यह मानो आत्मा और ब्रह्मांड का मिलन था।
लोग अपने-अपने हाथों में छोटे दीये लेकर गंगा में प्रवाहित करने लगे।
धीरे-धीरे गंगा दीपों का सागर बन गई।
हजारों दीप जल पर तैर रहे थे, मानो आसमान के तारे धरती पर उतर आए हों।
राघव मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था। हर दीप जैसे कोई प्रार्थना थी, हर लौ जैसे किसी के दिल की पुकार।
उसके मन में आया—
“यह दीप केवल रोशनी नहीं, यह मनुष्यों की आत्मा का प्रतीक हैं।
हर आत्मा जल रही है, बह रही है, और अंततः गंगा में विलीन हो रही है।”
आरती के स्वर ऊँचे होते गए।
ढोल की थाप, शंखनाद और मंत्रोच्चार ने वातावरण को कंपा दिया।
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर भी एक दीप जल उठा है।
यह दीप कोई साधारण लौ नहीं थी—यह
आत्मा का प्रकाश था।
उसने देखा कि उसका शरीर मिट रहा है,
सिर्फ़ प्रकाश बचा है।
वह प्रकाश गंगा की लहरों में मिल रहा
है, आकाश में फैल रहा है।
उस क्षण उसे लगा कि वह गंगा है, दीप है, मंत्र है, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड भी।
वह भीतर से फूट पड़ा—
“मैं कुछ नहीं हूँ… मैं सब कुछ हूँ!”
जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसके पास वही वृद्ध साधु खड़े थे।
उनकी आँखों में करुणा थी।
उन्होंने मुस्कराकर कहा— “बाबा, तूने पहली बार आत्मा
के प्रकाश की झलक पाई ह।
बाकिर याद रखऽ—ई बस झलक ह।चौथा द्वार
अभी बाकी बा।
ई दीप तके राह दिखइहें, बाकिर दरवाजा तोहरा भीतर से खुलेगा।”
राघव ने उनके चरण छुए।
उसके दिल में अब कोई प्रश्न नहीं था,
सिर्फ़ कृतज्ञता थी।
गंगा की लहरों में दीप अब भी तैर रहे थे।
चाँद आसमान में उग आया था और जल में
उसका प्रतिबिंब हजारों दीपों के बीच झिलमिला रहा था।
राघव ने मन ही मन कहा— “मैंने
भय को जीता, मोह को छोड़ा,
अहंकार का विसर्जन किया।
अब मैंने आत्मा की झलक देखी है। अब
मैं तैयार हूँ चौथे द्वार के लिए।”
उसके चेहरे पर मुस्कान थी। वह
जानता था कि उसकी यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है।
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