सुबह का समय था।
मणिकर्णिका घाट पर चिताएँ जल रही थीं।
धुआँ आसमान में उठ रहा था और गंगा की
लहरें उसे अपने साथ बहा रही थीं।
राघव चुपचाप सीढ़ियों पर बैठा था।
उसके चारों ओर जीवन और मृत्यु दोनों
का संगम था—कहीं कोई नया जन्म मनाया जा रहा था, कहीं किसी की विदाई।
उसने सोचा—
“काशी में जीवन और मृत्यु दोनों एक
साथ चलते हैं।
यहीं समझ आता है कि जो आता है वह
जाएगा और जो जाता है वह लौटकर आएगा।
सिर्फ आत्मा ही शाश्वत है।”
उसने आँखें बंद कीं।
भीतर से एक स्वर गूँज उठा—
“राघव, तूने चारों द्वार पार कर लिए।
लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती।
मुक्ति पाना आसान है, पर मुक्ति को जीना कठिन है।”
उसके भीतर जैसे आत्मा ही उससे संवाद कर रही थी।
वह कह रही थी—
“अब तुझे दूसरों के लिए दीप बनना है।
तेरी मुक्ति अधूरी है जब तक तू करुणा
का प्रकाश सब तक नहीं पहुँचाता।”
राघव घाट से उठा।
वह बनारस की गलियों में चलने लगा।
संकीर्ण गलियाँ, पुकार लगाते ठेलेवाले, मंदिरों की घंटियाँ, और साधुओं की मंडलियाँ—सबमें उसे वही प्रकाश दिखने
लगा।
एक जगह उसने देखा, एक
बूढ़ी औरत अकेली बैठी थी, हाथ
में भीख का कटोरा।
राघव उसके पास गया, उसके चरण छुए और बोला—
“माँ, तुम भी गंगा हो, तुम भी आत्मा हो।
मेरे पास देने को कुछ नहीं, पर मेरा हृदय तुम्हारे लिए खुला है।”
औरत रो पड़ी।
वह बोली—
“बाबा, तू पहली बार मिला है जो मुझे भी आत्मा कह रहा है।
बाकी सब मुझे बोझ मानते हैं।”
उस दिन से राघव ने यह प्रण लिया कि वह हर प्राणी में प्रकाश देखेगा।
कुछ ही दिनों बाद वह वृद्ध साधु फिर उसके पास आए।
लेकिन इस बार वे पहले जैसे ठहरे हुए
नहीं थे—उनके चेहरे पर अलौकिक तेज़ था।
उन्होंने कहा—
“बाबा, अब तोहरे गुरु के काम पूरा भइल।
हम तोहरा साथ बस तब तक रहनीं जब तक तू
चौथा द्वार ना पार कर ले।
अब तू खुद दूसरों के लिए द्वार है।”
राघव की आँखें भर आईं।
उसने कहा—
“महाराज, आप तो मुझे छोड़कर जा रहे हैं?”
साधु मुस्कराए—
“ना रे बाबा।
गुरु कहीं जाता है?
गुरु तो भीतर बस जाता है।
अब जब तू आँख बंद करेगा, तोहरा भीतर हम ही बोलब।”
इतना कहकर साधु प्रकाश में विलीन हो गए।
राघव जान गया कि उसका गुरु हमेशा उसके
साथ है।
राघव गंगा किनारे बैठा और अपने हाथ में एक दीप जलाया।
वह दीप उसने गंगा में प्रवाहित किया
और देखा—लहरों ने उसे अपने साथ बहा लिया।
उसने मन ही मन कहा—
“गंगे मैया, अब मैं भी दीप हूँ।
मुझे भी बहा लो, जहाँ अंधेरा है वहाँ तक पहुँचाओ।
मेरी मुक्ति अब सिर्फ़ मेरी नहीं,
यह सबकी है।”
दिन महीनों में बदल गए।
अब लोग उसे “साधु” या “संत” कहने लगे।
पर राघव ने कभी इन नामों को स्वीकार
नहीं किया।
वह बस मुस्कराता और कहता—
“मैं तो बस यात्री हूँ, बाकी सब तुम्हारी गंगा है।”
धीरे-धीरे उसकी करुणा ने कई जीवन बदल दिए।
गरीब बच्चों के लिए उसने पाठशाला शुरू
की, बीमारों की सेवा की,
विधवाओं और अनाथों को सहारा दिया।
काशी की गलियाँ जो पहले उसके लिए
अजनबी थीं, अब उसका परिवार बन
चुकी थीं।
उसका प्रकाश अब केवल उसके भीतर नहीं था—वह समाज में फैल चुका था।
रात आई।
हजारों दीप फिर से गंगा में प्रवाहित
किए गए।
राघव भी उनमें एक दीप लेकर खड़ा था।
उसने गंगा से कहा—
“आज मेरा दीप मेरा नहीं, यह उन सबका है जिन्होंने मुझे रास्ता
दिखाया—भय, मोह, अहंकार, गुरु और तुम, गंगे मैया।”
दीप धीरे-धीरे लहरों में दूर चला गया।
राघव मुस्कराया।
उसके चेहरे पर वही शांति थी जो सिर्फ़
मुक्ति से नहीं, सेवा से मिलती
है।
“मुक्ति भीतर है, पर उसका फल बाहर बाँटना ही सच्चा जीवन है।”
No comments:
Post a Comment