राघव अब चौथा द्वार पार कर चुका था।
उसके भीतर आत्मा का प्रकाश जल उठा था।
गंगा किनारे वह बैठा था और भीतर एक
गहरी शांति महसूस कर रहा था।
उसका मन बार-बार कह रहा था— “अब सब कुछ मिल गया। अब कुछ पाने को नहीं बचा।”
लेकिन तभी भीतर से एक और प्रश्न उठने लगा—
“अगर सब मिल गया, तो अब जीने का अर्थ क्या है?
क्या यहीं यात्रा समाप्त हो जाती है?
क्या जीवन केवल आत्मा की मुक्ति तक
सीमित है?”
वह वृद्ध साधु फिर उसके पास आ गए।
उनकी मुस्कान में अब कठोरता नहीं,
केवल करुणा थी।
वे बोले— “बाबा, अब तोहरा भीतर प्रश्न उठल बा।
ई प्रश्न सही बा।
मुक्ति पा लेने के बाद भी जीवन खाली
काहे लगेला?
ई खालीपन बतावत बा कि अभी राह बाकी
बा।”
राघव ने पूछा— “लेकिन
महाराज, मैंने तो सब छोड़
दिया—भय, मोह, अहंकार…
अब और क्या बाकी है?”
साधु ने उत्तर दिया—
“बाकी बा सेवा।
बाकी बा करुणा।
सच्ची मुक्ति तब होखेला जब तू अपना
रोशनी दूसरन तक बाँटे।
जैसे गंगा अपनों में ना रुकला,
बलुक बहत-बहत सबके तृप्त करेला।”
उस रात राघव अकेला गंगा किनारे बैठा था।
उसने लहरों को निहारा।
हर लहर कहीं से आती, कहीं बहती और अंततः सागर में मिल जाती।
राघव ने मन ही मन पूछा—
“गंगे मैया, क्या यही जीवन का अर्थ है?
बहना, देना और अंततः विलीन हो जाना?”
लहरें मानो उत्तर दे रही थीं— “हाँ राघव, जीवन का अर्थ
केवल पाना नहीं, बल्कि देना
है।
तूने प्रकाश पाया, अब उसे दूसरों तक पहुँचा।”
अगली सुबह वह मणिकर्णिका घाट गया।
वहाँ चिताएँ जल रही थीं।
लोग रो रहे थे।
जीवन और मृत्यु का सबसे कठोर सत्य
वहाँ सामने था।
एक छोटा बच्चा अपने पिता की चिता के पास रो रहा था।
उसके पास कोई नहीं था।
राघव उसके पास बैठ गया, उसे गोद में ले लिया।
उसने कुछ नहीं कहा, बस उसकी पीठ पर हाथ रखा।
बच्चा धीरे-धीरे शांत हो गया।
राघव की आँखों में आँसू थे।
उसने महसूस किया— “यही करुणा है।
यही मुक्ति का अर्थ है—दूसरे के दुख
को बाँटना।”
दिन बीतते गए।
राघव अब साधक नहीं रहा, न ही कोई ‘गुरु’।
वह घाटों पर, गलियों में, अनाथ बच्चों के बीच, बीमार
बुज़ुर्गों के पास समय बिताने लगा।
कभी उनके लिए भोजन लाता, कभी बस उनके साथ बैठ जाता।
लोग धीरे-धीरे उसे पहचानने लगे।
कोई कहता—“यह साधु है।”
कोई कहता—“यह सेवक है।”
लेकिन राघव के मन में अब कोई पहचान
नहीं थी।
वह सिर्फ़ मुस्करा देता।
उसे समझ आ गया था—
“मुक्ति का अर्थ अपने लिए नहीं,
सबके लिए है।
सच्चा प्रकाश तब है जब वह अंधेरे को
मिटाने दूसरों तक पहुँचे।”
एक रात वही वृद्ध साधु फिर उसके पास आए।
उन्होंने कहा—
“बाबा, अब तोरा राह साफ बा।
तोरा चौथा द्वार खुलल, बाकिर ई यात्रा अब भी चल रहल बा।
तू जियs तब ले सेवा करs, करुणा बाँटs।
यही तोहार सच्चा धर्म बा।”
राघव ने उनके चरण छुए।
उसके भीतर अब कोई प्रश्न नहीं था।
अब केवल प्रेम था, केवल करुणा।
गंगा की लहरें चाँदनी में झिलमिला रही थीं।
राघव ने दीप जलाकर गंगा में प्रवाहित
किया।
उसके मन ने कहा—
“यह दीप अब सिर्फ़ मेरी आत्मा का
प्रतीक नहीं, यह उन सब आत्माओं
के लिए है जो अंधेरे में हैं।”
वह मुस्कराया।
अब उसे पता था—
जीवन का अर्थ मुक्ति पाना नहीं, बल्कि मुक्ति बाँटना है।
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