राघव बनारस जाने वाली ट्रेन में बैठा था। खिड़की से बाहर दौड़ते खेत, छोटे-छोटे स्टेशन, बिखरी बस्तियाँ और गाँव पीछे छूटते जा रहे थे। उसके मन में विचारों का बवंडर चल रहा था।
उसकी उम्र अब चालीस पार कर चुकी थी। जीवन की आधी से अधिक यात्रा पूरी हो गई थी,
लेकिन संतोष की बजाय उसमें खालीपन ही
भरता जा रहा था।
वह दिल्ली की भीड़भाड़ में नौकरी करता था। काम अच्छा था, तनख्वाह भी बुरी नहीं थी। मगर भीतर का शून्य
दिन-प्रतिदिन बड़ा होता गया।
कभी वह सोचता—“क्या यही जीवन है? सुबह दफ़्तर, शाम थका हुआ
घर, महीने की तनख्वाह और फिर
वही चक्र?”
उसके दोस्त कह चुके थे— “तू
बेवजह ज़्यादा सोचता है। सबकी ज़िंदगी ऐसी ही है।”
लेकिन राघव का मन यह मानने को तैयार नहीं था।
उसे लगता था कि जीवन का अर्थ कहीं और छिपा है, शायद वह जो कर रहा है वह सिर्फ़ एक अभिनय है।
राघव की शादी भी हो चुकी थी, लेकिन वैवाहिक जीवन में मिठास कम और तकरार ज़्यादा थी।
पत्नी उसे अकसर ताने देती—
“तुम्हें कभी संतोष क्यों नहीं होता? दुनिया में लाखों लोग ऐसा ही जीवन जीते हैं, मगर तुम्हें हमेशा किसी और चीज़ की तलाश रहती है।”
एक बेटा भी था, जो किशोर
अवस्था में था।
पढ़ाई और मोबाइल की दुनिया में खोया हुआ।
पिता और बेटे के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी।
राघव को लगता, घर में भी
वह अजनबी बन गया है।
उसके मन में असफलताओं का बोझ था—
छोटी उम्र से उसने लेखक बनने का सपना देखा था, लेकिन दो-तीन असफल कोशिशों के बाद उसने क़लम छोड़
दी।
वह सोचता— “मैं किस काम का?
न अच्छा पति, न अच्छा पिता, न सफल लेखक… बस एक मशीन।”
ऐसे ही एक दिन वह अचानक एक किताब पढ़ रहा था।
उसमें लिखा था—
“काशी वह स्थान है जहाँ आत्मा को अपने सच्चे स्वरूप का दर्शन होता है।
वहाँ चार अदृश्य द्वार हैं, जिनसे होकर ही मुक्ति मिलती है।”
राघव ठिठक गया।
काशी का नाम उसने कई बार सुना था, लेकिन इस तरह कभी नहीं सोचा।
चार द्वार?
मुक्ति का मार्ग?
क्या यह सिर्फ़ एक कथा है, या सचमुच कुछ है वहाँ?
उस रात उसे नींद नहीं आई।
वह करवट बदलता रहा और मन में वही विचार घूमते रहे।
सुबह होते-होते उसने निश्चय कर लिया—
“मुझे जाना है। शायद वहीं मुझे अपने प्रश्नों का उत्तर मिलेगा।”
ट्रेन की सीटी बजी और खिड़की से बाहर दिखा—गंगा के किनारे बसा बनारस नज़दीक आ
रहा था।
स्टेशन पर पहुँचते ही शोर, धक्का-मुक्की और गाड़ियों की आवाज़ों ने उसका स्वागत किया।
राघव ने बैग कंधे पर डाला और बाहर निकला।
स्टेशन से निकलते ही उसने देखा—
रिक्शे वाले ऊँची आवाज़ में पुकार रहे थे—
“घाट चलऽ बाबू! दशाश्वमेध, अस्सी, मणिकर्णिका… कहीं
भी पहुँचा देब!”
पान की दुकानों से गुटखे और तंबाकू की गंध आ रही थी।
भीड़ में पुजारी, साधु,
विद्यार्थी, विदेशी पर्यटक सब घुलमिल गए थे।
राघव ने सोचा—
“यह शहर अलग है। यहाँ हर चेहरा किसी रहस्य से भरा है।”
वह सीधे रिक्शे से दशाश्वमेध घाट पहुँचा।
गंगा का पहला दर्शन करते ही उसके कदम थम गए।
सूरज डूब रहा था।
वहीं एक ओर अंतिम संस्कार हो रहा था—धुएँ के गुबार उठ रहे थे।
जीवन और मृत्यु का यह अद्भुत संगम देखकर राघव सन्न रह गया।
दिल से आवाज़ निकली— “यही
काशी है… जहाँ जीवन और मृत्यु साथ-साथ बहते हैं।”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसे लगा कि गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि माँ है, जो सबको
अपने आँचल में समेट लेती है।
राघव घाट की सीढ़ियों पर बैठा ही था कि एक वृद्ध साधु उसके पास आकर बोले—
“का खोजत बाड़ऽ, बाबू?”
राघव चौंका।
“मैं… मैं सत्य की तलाश में हूँ। जीवन का अर्थ समझना चाहता हूँ।”
साधु मुस्कराए—
“अच्छा! तब त सही जगह आइल बाड़ऽ।
काशी तोहरे जइसन भटके आत्मा के अपने ओर खींच लेला।
लेकिन याद रखऽ, यहाँ चार
द्वार ह।
एह चार द्वार के बिना मुक्ति ना मिली।”
राघव का दिल धड़कने लगा।
उसे लगा मानो किताब के शब्द जीवित होकर सामने खड़े है
साधु ने आगे कहा—
“पहिला द्वार भय के बा।
दूसरा मोह के।
तीसरा अहंकार के।
आ आखिरी—आत्मा के प्रकाश के।
तू तैयार बा?
ई यात्रा आसान ना होई।
लेकिन एक बेर ई रास्ता पकड़ ले, त लौट के जइबे ना।”
राघव की आँखों में दृढ़ता थी।
“हाँ महाराज। मैं तैयार हूँ।
चाहे कुछ भी हो, मुझे इन
द्वारों को देखना ही है।”
साधु मुस्कराए और धीरे-धीरे भीड़ में गुम हो गए।
राघव समझ गया—काशी ने उसे बुला लिया है।
अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं।
रात गहरी हो रही थी।
घंटियों और शंख की आवाज़ें अब भी वातावरण में गूँज रही थीं।
दीपक गंगा पर तैर रहे थे।
राघव घाट की सीढ़ियों पर बैठा सोच रहा था—
“कल से मेरी असली यात्रा शुरू होगी।
चार द्वार… और शायद मेरी आत्मा का उत्तर।”
उसके भीतर भय भी था, उत्साह
भी।
लेकिन सबसे गहरी भावना यह थी कि—
काशी ने उसे अपना लिया है।
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