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यह अध्याय “काशी के चार द्वार” पुस्तक पर आधारित है।
रात गहरी हो चुकी थी।
काशी के घाटों पर दिन की भीड़-भाड़ अब शांत हो गई थी।
सिर्फ़ लहरों की आवाज़ और कहीं-कहीं से आती कुत्तों की भौंक सुनाई दे रही थी।
चाँद की रोशनी गंगा की लहरों पर झिलमिला रही थी।
राघव दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर अकेला बैठा था।
उसका मन बेचैन था।
साधु की बात उसके कानों में गूँज रही थी—
“पहिला द्वार भय के बा।”
वह सोच रहा था—
“भय… मगर किस बात का भय?
क्या अंधेरे का, मौत का,
अकेलेपन का… या अपने ही भीतर का?”
उसने तय किया कि घाट पर बैठकर इंतज़ार करना बेकार है।
वह उठा और गंगा किनारे की गलियों की ओर बढ़ा।
रात के इस समय वे गलियाँ किसी भूलभुलैया से कम नहीं थीं।
दीवारों पर टिमटिमाते दीपक और कहीं-कहीं टंगे बल्ब जैसे अंधेरे से लड़ने की
कोशिश कर रहे थे।
लेकिन गलियों में जितना आगे बढ़ता, उतना ही अंधेरा गहराता जाता।
अचानक उसे लगा कि कोई उसका पीछा कर रहा है।
उसने मुड़कर देखा—कोई नहीं।
फिर भी कदमों की आहट सुनाई दे रही थी।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
गली के मोड़ पर उसे एक लम्बी परछाईं दिखी।
वह काँप गया।
“कौन है वहाँ?” उसने आवाज़
लगाई।
कोई उत्तर नहीं।
लेकिन परछाईं हिली और धीरे-धीरे दीवार से अलग होकर सामने आ खड़ी हुई।
वह आकृति काली थी, मानो
धुएँ से बनी हो।
उसकी आँखें लाल अंगारे जैसी चमक रही थीं।
राघव पीछे हट गया।
आकृति ने भारी आवाज़ में कहा—
“तू कौन है जो मेरे क्षेत्र में आया है?
यह भय का द्वार है… जो यहाँ आया, वह बचकर नहीं जा सकता।”
राघव का गला सूख गया।
वह काँपते हुए बोला— “मैं
सत्य की खोज में हूँ… चार द्वार पार करना चाहता हूँ।”
डर ही तेरा पहला कैदखाना है।”
राघव भागना चाहता था, मगर
कदम जमे हुए थे।
उसके भीतर अजीब-सा कंपन हो रहा था।
उसे अपने बचपन की याद आई—
जब वह छोटा था और अंधेरे कमरे में अकेला बंद कर दिया जाता, तो वह रोने लगता था।
उसे वह रात याद आई जब पिता की मृत्यु हुई थी और उसने श्मशान की आग देखी थी।
दिल दहल गया था।
अचानक वही दृश्य सामने आ गया—
श्मशान, जलती चिता,
रोती भीड़…
राघव चीख पड़ा।
“नहीं! मैं यह सब फिर से नहीं देख सकता!”
आकृति बोली—
“यही तो भय है… जिसे तू दबाता रहा, वही आज सामने खड़ा है।”
उसी समय उसे हवा में धीमी-सी फुसफुसाहट सुनाई दी।
जानी-पहचानी आवाज़ थी— “डर
से भाग मत, बाबा।
ओके अपनावऽ।
डर बाहर ना, भीतर बा।”
राघव ने चारों ओर देखा, मगर
साधु कहीं नहीं दिखे। सिर्फ़ उनकी आवाज़ गूँज रही थी।
उसने गहरी साँस ली और खुद से कहा—
“ठीक है… अगर मुझे मुक्ति चाहिए तो मुझे डर से भागना
नहीं, उसका सामना करना
होगा।”
वह आकृति अब और पास आ गई थी।
उसकी आँखों से आग जैसी लपटें निकल रही थीं।
राघव काँप रहा था, लेकिन
उसने आँखें बंद कर लीं और सीधा खड़ा हो गया।
लेकिन अब मैं भागूँगा नहीं।”
फिर हवा के झोंके के साथ गायब हो गई।
गली की दीवारों के बीच एक चमकदार दरवाज़ा प्रकट हुआ।
वह नीले प्रकाश से चमक रहा था।
राघव का दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था, लेकिन भीतर एक अजीब-सी राहत थी।
उसने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाए।
दरवाज़े से पहले उसने गंगा की ओर देखा।
चाँदनी लहरों पर चमक रही थी, मानो उसे आशीर्वाद दे रही हो।
राघव ने दरवाज़े को छुआ।
उसने गहरी साँस ली और अंदर कदम रख दिया। पहला द्वार पार हो गया था।
दरवाज़े के पार रोशनी की एक नई दुनिया थी।
राघव जानता था—यह तो बस शुरुआत है।
आगे के द्वार और कठिन होंगे।
लेकिन अब उसके भीतर आत्मविश्वास था।

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