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Jun 3, 2026

त्रैलंग स्वामी - शिव के अवतार की जीवनी - परिशिष्ट 1: त्रैलंग स्वामी के प्रेरक वचन

 त्रैलंग स्वामी (Trailanga Swami) भारत के महानतम योगियों में से एक माने जाते हैं। वे 18वीं से 19वीं सदी के बीच वाराणसी में सक्रिय रहे और अपने तप, ज्ञान, मौन, एवं अलौकिक शक्तियों के लिए प्रसिद्ध थे। उनके कथन आज भी साधकों और seekers को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं। नीचे त्रैलंग स्वामी के कुछ प्रेरक वचनों का विस्तृत व्याख्या सहित विवेचन किया गया है: त्रैलंग स्वामी (1607–1887) भारत के महान योगी, अद्वैत वेदांत के सिद्ध संत, तथा काशी (वाराणसी) के तपस्वी महापुरुष माने जाते हैं। उनका जीवन और वचन आज भी साधकों के लिए प्रकाशस्तंभ हैं। नीचे उनके कुछ प्रेरक वचनों का विस्तार से विवेचन किया गया है:

 जो मौन को समझ गया, वह ब्रह्म को पा गया।”

विस्तार:
त्रैलंग स्वामी मौन को साधना की उच्च अवस्था मानते थे। मौन केवल वाणी का न होना नहीं, बल्कि अंतःकरण की शांति है। जब मन की चंचलता समाप्त होती है, तब आत्मा ब्रह्म से एक हो जाती है। मौन की गहराई में ही आत्मबोध संभव है। इसलिए, जिसने मौन का रहस्य जान लिया, उसने ब्रह्म की अनुभूति कर ली।

 जब तक देह सत्य लगती है, आत्मा भ्रमित रहती है।”

विस्तार:
यह कथन अद्वैत वेदांत की मूल भावना को दर्शाता है। जब तक हम अपने को शरीर मानते हैं, आत्मा की पहचान संभव नहीं। देह नश्वर है, आत्मा अमर। देह को सत्य मानना आत्मा के भ्रम में रहने जैसा है। आत्मज्ञान तभी संभव है जब हम देह की सीमाओं से ऊपर उठें।

धर्म वह है जो सबको जोड़ता है – जो तोड़े, वह अधर्म है।”

विस्तार:
धर्म का मूल उद्देश्य है–समाज में प्रेम, समरसता और एकता स्थापित करना। यदि किसी विचार, परंपरा या कर्म से भेद, घृणा या अलगाव उत्पन्न होता है, तो वह धर्म नहीं, अधर्म है। त्रैलंग स्वामी के अनुसार सच्चा धर्म वह है जो सबको जोड़ता है, चाहे वह किसी भी संप्रदाय, जाति या भाषा का हो।

 सेवा, ध्यान से ऊँचा कोई योग नहीं।”

विस्तार:
सेवा को त्रैलंग स्वामी ने योग से भी ऊँचा बताया, क्योंकि सेवा में निस्वार्थ भाव, समर्पण और करुणा समाहित होती है। जब व्यक्ति ईश्वर को हर जीव में देखता है, तब सेवा स्वयं ध्यान बन जाती है। निःस्वार्थ सेवा से ही मन की शुद्धि होती है और योग की सच्ची अवस्था प्राप्त होती है।

गुरु वही है, जो तुम्हें स्वयं से मिला दे।”

विस्तार:
गुरु का कार्य केवल शास्त्र पढ़ाना नहीं, बल्कि शिष्य को उसके सत्य स्वरूप से जोड़ना है। सच्चा गुरु वह है जो अहंकार को नष्ट कर आत्मा का बोध कराए। त्रैलंग स्वामी के अनुसार गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, स्वयं एक पुल होते हैं– आत्मा से परमात्मा तक पहुँचाने का।

सत्य ही ईश्वर है।”

विस्तार:
यह वाक्य त्रैलंग स्वामी की अद्वैत साधना की मूल भावना को व्यक्त करता है। ईश्वर को किसी रूप, नाम या मूर्ति में बाँधा नहीं जा सकता – वह तो शुद्ध सत्य है। जो सत्य को पहचान लेता है, वह ईश्वर को पहचान लेता है। सत्य की खोज ही साधक को ईश्वर तक पहुँचाती है।

योग वह है जो आत्मा को परमात्मा से मिलाता है।”

विस्तार:
त्रैलंग स्वामी के अनुसार योग केवल आसनों या शारीरिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है। योग आत्मा और परमात्मा के मिलन की प्रक्रिया है। जब मन शांत होता है, और इंद्रियाँ नियंत्रित होती हैं, तब योग की स्थिति आती है। यह मिलन ही मोक्ष है।

 शिवत्व केवल पूजा में नहीं, व्यवहार में भी हो।”

विस्तार:
सच्ची शिव-भक्ति केवल पूजा, मंत्र और व्रतों तक सीमित नहीं होती। शिवत्व का अर्थ है–करुणा, क्षमा, विवेक और त्याग को जीवन में उतारना। त्रैलंग स्वामी स्वयं शिव के अवतार माने जाते थे और उनके जीवन में यह शिवत्व व्यवहार में प्रकट होता था।

साधना का फल तप से नहीं, समर्पण से मिलता है।”

विस्तार:
तप, नियम और कठिन साधनाएँ तभी फलदायक होती हैं जब उनमें पूर्ण समर्पण हो। त्रैलंग स्वामी के अनुसार, अहंकार छोड़कर जब साधक स्वयं को पूर्णतः ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है, तब साधना सफल होती है। केवल कठोर नियमों से नहीं, भावपूर्ण समर्पण से आत्मसाक्षात्कार होता है।

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