एक बार त्रैलंग स्वामी गंगा नदी में घंटों तक बिना थके तैरते रहे। उनके शिष्य किनारे पर खड़े चिंतित हो उठे — “स्वामीजी, आप इतने समय तक जल में कैसे रह सकते हैं?”
स्वामी
शांत भाव से मुस्कराए और बोले —
“जल
मेरा ही स्वरूप है। जब भेद मिट जाता है, तब जल और मैं अलग नहीं रहते। यह तत्व की
अनुभूति है।”
यह
कहकर उन्होंने सबको आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का पाठ पढ़ाया।
चोर भी मेरा ही अंश है
वाराणसी
में एक रात एक चोर ने स्वामीजी के वस्त्र चुरा लिए। प्रातः जब वह पकड़ा गया और
लोगों ने उसे दंड देने की बात की, स्वामी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा —
“उसे
दंड क्यों? वह भी मेरे ही अंश का है। जिसने लिया, वह उसी
का था। मेरे पास कुछ भी अपना नहीं।”
यह सुनकर चोर की आंखों में आंसू भर आए और वह स्वामी का शिष्य बन गया।
शिव सदा तुम्हारे पास हैं
एक दिन
एक भक्त दुःख से व्याकुल होकर स्वामीजी के पास आया। उसने कांपते स्वर में कहा —
“स्वामीजी, मैंने शिव को बहुत पुकारा, पर वे नहीं आए।”
स्वामीजी ने उसे स्नेह से देखा और बोले —
“जब तुम
शिव को सच्चे मन से पुकारते हो, तब शिव स्वयं तुम्हारे भीतर प्रकट होते हैं।
तुम्हारा हृदय ही शिव का धाम है।”
भक्त
की आंखें खुल गईं और उसके भीतर शांति उतर आई।
मौन ही उपदेश है
एक बार
एक विद्वान स्वामीजी से तर्क करने आया। उसने अनेक शास्त्रों की बातें कीं, पर
स्वामी मौन रहे।
अंत
में विद्वान झुंझलाकर बोला — “आप उत्तर क्यों नहीं देते?”
स्वामीजी ने नेत्र मूंदे हुए
उत्तर दिया —
“जहाँ
मौन बोलता है, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं। सत्य का अनुभव
वाणी से नहीं होता।”
विद्वान
नतमस्तक होकर चला गया।
भिक्षा और अभयदान
एक
वृद्धा रोज़ स्वामी को भिक्षा देती थी। एक दिन जब उसके पास कुछ न था, उसने
रोते हुए कहा — “आज मैं कुछ नहीं दे सकी।”
स्वामी
मुस्कराए और बोले —
“आज
तुमने मुझे सबसे मूल्यवान दान दिया — प्रेम और समर्पण। भिक्षा वस्तु की नहीं, भाव की
होती है।”
गुरु वही जो दृष्टि दे
एक
नेत्रहीन युवक स्वामी के पास आया और बोला — “क्या आप मुझे दृष्टि दे सकते हैं?”
स्वामी
ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा —
“बाहरी
आँखें तो संसार दिखाती हैं, पर अंतर की आँख जाग जाए, तो
ईश्वर दिखता है। तू देख, तू सब कुछ देख सकता है।”
वह युवक ध्यान में डूब गया और धीरे-धीरे उसके भीतर का अंधकार मिटने लगा।
No comments:
Post a Comment