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Dec 11, 2025

शिवलिंग और सात चक्रों का सम्बन्ध

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में शिवलिंग केवल एक पत्थर या प्रतिमा नहीं माना जाता, बल्कि इसे ब्रह्मांड की ऊर्जा और चेतना का गहरा प्रतीक समझा गया है। इसी तरह, सात चक्र मानव शरीर के भीतर स्थित ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं, जिन्हें जागृत करके मनुष्य उच्च चेतना तक पहुँच सकता है। जब हम इन दोनों अवधारणाओं को साथ में समझते हैं, तो पता चलता है कि शिवलिंग का रूप वास्तव में मानव शरीर में ऊर्जा के उठने, रूपांतरित होने और परम चेतना से मिलने की यात्रा को बहुत सुंदर ढंग से दर्शाता है।

1. शिवलिंग का सरल अर्थ

शिवलिंग दो भागों से मिलकर बना होता है—

लिंग (ऊपर का भाग) और योनि (आधार भाग)

  • लिंग उस दिव्य चेतना का प्रतीक है जो ऊपर की ओर बढ़ती है।

  • योनि शक्ति, प्रकृति और ऊर्जा का आधार मानी जाती है।

एक तरह से शिवलिंग यह बताता है कि जीवन की शुरुआत शक्ति से होती है और उसका अंतिम लक्ष्य शिव यानी परम चेतना से मिलना है।

Jun 6, 2025

गुरु से शिष्य को कैसे सीखना चाहिए? – सद्गुरु के विचारों से गहराई से जानें

 भारतीय संस्कृति में 'गुरु' केवल शिक्षक नहीं होते, वे हमारे जीवन को दिशा देने वाले दीपस्तंभ होते हैं। जब बात आत्मिक उन्नति और जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने की हो, तो एक सच्चे गुरु की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मशहूर योगी और आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने समय-समय पर गुरु-शिष्य संबंध की महिमा को अपने अनोखे दृष्टिकोण से समझाया है।

इस लेख में हम जानेंगे कि गुरु से शिष्य को कैसे सीखना चाहिए, और सद्गुरु इसके बारे में क्या कहते हैं।


सद्गुरु कहते हैं:

“गुरु कोई ऐसा नहीं जो मशाल लेकर तुम्हारे लिए रास्ता दिखाए, वह स्वयं ही मशाल है।”

इसका मतलब यह है कि गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे स्वयं ज्ञान का स्रोत होते हैं। उनके माध्यम से शिष्य अपने भीतर के अंधकार को पार कर सकता है। एक सच्चा गुरु शिष्य को उसके सीमित विचारों और भ्रमों से बाहर निकालकर चेतना के उच्च स्तर पर ले जाता है।

🌱 शिष्य – कैसे बने सीखने के योग्य?

सद्गुरु बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शिष्य को अपने भीतर से अहंकार, पूर्वग्रह और ‘मुझे सब पता है’ जैसी सोच को हटाकर, खुद को खाली पात्र बनाना चाहिए।
वे कहते हैं:

"केवल खाली पात्र ही भरा जा सकता है।"

सीखने की प्रक्रिया वहीं से शुरू होती है जहाँ जिज्ञासा और विनम्रता मिलते हैं।

गुरु से केवल प्रश्न पूछना या इच्छाएं रखना उचित नहीं होता। सद्गुरु कहते हैं:

"Seek not what you desire, seek what transforms you."

इसका अर्थ है कि गुरु से हमें वह मांगना चाहिए जो हमें भीतर से रूपांतरित कर सके, न कि केवल वह जो हमारी मनचाही इच्छा पूरी करे।
सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की कृपा और ऊर्जा को पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार करता है।

गुरु और शिष्य का रिश्ता केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है। यह एक ऊर्जा संबंध है। सद्गुरु अकसर आदि योगी (शिव) और सप्तऋषियों की कथा सुनाते हैं जहाँ ज्ञान मौन रूप से स्थानांतरित हुआ।

सद्गुरु के अनुसार, जब शिष्य पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ जुड़ता है, तो गुरु की मौन उपस्थिति भी उसके जीवन में आध्यात्मिक क्रांति ला सकती है।

आधुनिक समय में लोग अक्सर गुरु को जाँचने की प्रवृत्ति रखते हैं, लेकिन सद्गुरु स्पष्ट करते हैं:

“It’s not the Guru who is on trial, it’s the seeker.”

गुरु को परखने के बजाय शिष्य को चाहिए कि वह स्वयं की पात्रता बढ़ाने पर ध्यान दे। जब भीतर की तैयारी पूर्ण होती है, तभी गुरु की कृपा फल देती है।

यदि आप जीवन में एक सच्चे मार्गदर्शक की तलाश में हैं, तो सद्गुरु के ये विचार आपकी राह को रोशन कर सकते हैं।
शिष्य को चाहिए कि वह:

  • खुद को खाली और जिज्ञासु बनाए

  • गुरु पर संपूर्ण श्रद्धा रखे

  • गुरु से कुछ मांगने के बजाय आत्मिक उन्नति को प्राथमिकता दे

  • गुरु की मौन उपस्थिति को भी समझे और अनुभव करे

  • अपने अभ्यास और अनुशासन से स्वयं को योग्य बनाए

📌 संदर्भ:

यह लेख सद्गुरु के प्रवचनों, Sadhguru YouTube Channel और Isha Foundation वेबसाइट  पर आधारित है।

आप इस विषय पर अपने अनुभव या विचार भी कमेंट में साझा कर सकते हैं।