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Dec 11, 2025

शिवलिंग और सात चक्रों का सम्बन्ध

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में शिवलिंग केवल एक पत्थर या प्रतिमा नहीं माना जाता, बल्कि इसे ब्रह्मांड की ऊर्जा और चेतना का गहरा प्रतीक समझा गया है। इसी तरह, सात चक्र मानव शरीर के भीतर स्थित ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं, जिन्हें जागृत करके मनुष्य उच्च चेतना तक पहुँच सकता है। जब हम इन दोनों अवधारणाओं को साथ में समझते हैं, तो पता चलता है कि शिवलिंग का रूप वास्तव में मानव शरीर में ऊर्जा के उठने, रूपांतरित होने और परम चेतना से मिलने की यात्रा को बहुत सुंदर ढंग से दर्शाता है।

1. शिवलिंग का सरल अर्थ

शिवलिंग दो भागों से मिलकर बना होता है—

लिंग (ऊपर का भाग) और योनि (आधार भाग)

  • लिंग उस दिव्य चेतना का प्रतीक है जो ऊपर की ओर बढ़ती है।

  • योनि शक्ति, प्रकृति और ऊर्जा का आधार मानी जाती है।

एक तरह से शिवलिंग यह बताता है कि जीवन की शुरुआत शक्ति से होती है और उसका अंतिम लक्ष्य शिव यानी परम चेतना से मिलना है।

Jun 23, 2025

5 का महत्व – भारतीय संस्कृति में पंच का रहस्य

 भारत की सनातन परंपरा में संख्याओं का विशेष महत्व है। इनमें संख्या 5 (पंच) का स्थान अत्यंत विशेष है। पाँच न केवल एक संख्या है, बल्कि जीवन, प्रकृति और धर्म का संतुलन है। चाहे वह शरीर हो, पूजा पद्धति हो या ब्रह्मांड की संरचना — हर जगह ‘पंच’ की झलक मिलती है।


इस लेख में हम जानेंगे “5 का महत्व” भारतीय परंपरा और जीवन के विभिन्न पहलुओं में।


🌿 पंचतत्व – जीवन के पाँच आधार

जीवित शरीर इन्हीं पंचतत्वों से बना है:


पृथ्वी – स्थिरता व आधार


जल – शुद्धता व प्रवाह


अग्नि – ऊर्जा व तेज


वायु – प्राणवायु व गति


आकाश – चेतना व विस्तार

Mar 25, 2025

केदारनाथ यात्रा: आस्था, रहस्य और प्रकृति का दिव्य संगम

उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर स्थित है, जो भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यह मंदिर तीन ओर से केदारनाथ, खर्चकुंड और भरतकुंड पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसके अतिरिक्त, यहां मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी नामक पांच नदियों का संगम भी है, जिनमें से वर्तमान में केवल अलकनंदा और मंदाकिनी ही बह रही हैं। सर्दियों के मौसम में मंदिर पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है, इस दौरान इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं और बैशाखी के बाद इन्हें खोला जाता है।

केदारनाथ का इतिहास

हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से दो, केदारनाथ और बद्रीनाथ, उत्तराखंड राज्य में स्थित हैं। प्राचीन धार्मिक कथाओं के अनुसार, हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें दर्शन दिए। इसके साथ ही, नर और नारायण के अनुरोध पर भगवान शिव ने वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने का आशीर्वाद भी प्रदान किया। इस प्रकार, केदारनाथ और बद्रीनाथ की धार्मिक महत्ता और उनके पीछे की पौराणिक कथाएँ हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखती हैं।

पूजा में प्रयोग होने वाले कुछ शब्द और उनका अर्थ?

1. पंचोपचार – गन्ध , पुष्प , धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने को ‘पंचोपचार’ कहते हैं।

2. पंचामृत – दूध , दही , घृत , मधु { शहद ] तथा शक्कर इनके मिश्रण को ‘पंचामृत’ कहते हैं।

3. पंचगव्य – गाय के दूध , घृत , मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में ‘पंचगव्य’ कहते हैं।

4. षोडशोपचार – आवाहन् , आसन , पाध्य , अर्घ्य , आचमन , स्नान , वस्त्र, अलंकार , सुगंध , पुष्प , धूप , दीप , नैवैध्य , ,अक्षत , ताम्बुल तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को ‘षोडशोपचार’ कहते हैं।

5. दशोपचार – पाध्य , अर्घ्य , आचमनीय , मधुपक्र , आचमन , गंध , पुष्प , धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने की विधि को ‘दशोपचार’ कहते हैं।

Mar 10, 2025

हनुमान चालीसा अर्थ सहित (Hanuman Chalisa with Meaning)





दोहा 

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

Shree Guru Charan Saroj Raj, Nij Man Mukar Sudhari,
Barnau Raghuvar Bimal Jasu, Jo dayaku Phal Chari

Budhi heen Tanu Janike, Sumirow, Pavan Kumar,
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Bikaar

अर्थ

श्री गुरु के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।

हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं। आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुखों व दोषों का नाश कार दीजिए।

With the dust of Guru's Lotus feet, I clean the mirror of my mind and then narrate the sacred glory of Sri Ram Chandra, The Supereme among the Raghu dynasty. The giver of the four attainments of life.

Knowing myself to be ignorent, I urge you, O Hanuman, The son of Pavan! O Lord! kindly Bestow on me strength, wisdom and knowledge, removing all my miseries and blemishes.

गीता योग - मोक्ष की प्राप्ति के लिए ध्यान और सेवा (Gita Yoga - Meditation and service to attain salvation)

मोक्ष की प्राप्ति के लिए ध्यान और सेवा का अभ्यास आवश्यक है। ध्यान हमें आत्मा की गहराइयों में ले जाता है, जहाँ हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं। यह एक साधना है, जो मन को एकाग्र करने और आत्मा के साथ जुड़ने में मदद करती है। जब हम ध्यान करते हैं, तो हम अपने भीतर की शांति और संतुलन को अनुभव करते हैं, जो मोक्ष की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।

संसार में सुखपूर्वक जीवन यापन के लिए सेवा कार्य अनिवार्य है। सेवा का अर्थ है दूसरों की भलाई के लिए अपने समय, ऊर्जा और संसाधनों का उपयोग करना। जब हम सेवा करते हैं, तो हम न केवल दूसरों की मदद करते हैं, बल्कि अपने भीतर भी एक गहरी संतोष और खुशी का अनुभव करते हैं। सेवा के माध्यम से हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सक्षम होते हैं, जो हमारे जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है।

Feb 28, 2025

जाने ईश्वर प्राप्ति के कितने मार्ग है (Know How many ways are there to attain God)

ईश्वर की प्राप्ति के लिए अनेक मार्ग उपलब्ध हैं, जिन्हें विभिन्न धार्मिक परंपराओं और दार्शनिक विचारों में भिन्न-भिन्न रूप से प्रस्तुत किया गया है। हिन्दू धर्म में मुख्यतः चार प्रमुख मार्गों को मान्यता दी गई है:

भक्ति मार्ग (Devotion Path): यह मार्ग ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम को केंद्रित करता है। भक्ति मार्ग एक आध्यात्मिक पथ है जो ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम के माध्यम से जोड़ता है। इसमें व्यक्ति भगवान की पूजा, भजन, मंत्र जाप, और अन्य धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से ईश्वर के साथ अपनी आत्मा का मिलन करता है। इस मार्ग का मुख्य उद्देश्य ईश्वर के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करना है, जिसमें व्यक्ति अपनी आत्मा को ईश्वर के साथ एकत्व में लाने का प्रयास करता है।

Feb 14, 2025

जाने कन्यादान का सही अर्थ एवं वास्तविक महत्व क्या है।



*कन्यादान का वास्तविक अर्थ*
कन्यादान एक पवित्र और महत्वपूर्ण हिंदू विवाह संस्कार है, जिसमें पिता अपनी पुत्री को वर के हाथों में सौंपते हैं। यह संस्कार विवाह के दौरान किया जाता है, जब पिता अपनी पुत्री को वर के साथ बैठाकर, उनके हाथों में हाथ देकर, और एक पवित्र मंत्र का उच्चारण करके कन्यादान करते हैं। यह एक भावनात्मक और आध्यात्मिक क्षण होता है, जिसमें पिता अपनी पुत्री के भविष्य की जिम्मेदारी वर को सौंपते हैं, जो कन्यादान के माध्यम से अब उसकी पत्नी बन जाती है।  कन्यादान से वर और वधू के बीच एक पवित्र और आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है। साथ ही  कन्यादान से दो परिवारों के बीच एक पवित्र और स्थायी संबंध स्थापित होता है। कन्यादान से समाज में स्थिरता और सामाजिक संरचना को बनाए रखने में मदद मिलती है।

Jan 6, 2025

Religious World - मृत्यु से डरना क्यों?

मृत्यु से डरना क्यों?

मृत्यु के बारे में समाज में कई तरह की धारणाएँ प्रचलित हैं। लेकिन जीवन और मृत्यु का असली स्वरूप क्या है? इस पर प्राचीन आचार्यों ने काफी कुछ लिखा है। आत्मा को शाश्वत माना गया है, जबकि शरीर को अस्थायी कहा गया है। आत्मा और पंच भौतिक शरीर का मिलन ही जीवन है, और इनका अलगाव मृत्यु कहलाता है। यदि हम मृत्यु के परिणाम पर विचार करें, तो यह सुखद प्रतीत होती है। जीवन और मृत्यु एक दिन और रात की तरह हैं; सभी जानते हैं कि दिन काम करने के लिए है और रात आराम करने के लिए। मनुष्य दिन में कार्य करता है, जिससे उसकी अंतःकरण, मन, बुद्धि और बाह्य इंद्रियाँ जैसे आँख, नाक, हाथ, पैर आदि थक जाते हैं। जब ये सभी थक जाते हैं, तब रात्रि आती है। दिन में जब मनुष्य की सभी इंद्रियाँ सक्रिय थीं, अब रात में उन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है।

Jan 5, 2025

आध्यात्मिकता के ज्ञान से जाने रोग तथा व्याधि का मनोवैज्ञानिक पहलू


आध्यात्मिकता के ज्ञान से जाने रोग तथा व्याधि का मनोवैज्ञानिक पहलू

मनुष्य का मन जगत नियन्ता का एक अद्भुत आश्चर्य है, वही समस्त जड़ चेतन का कारण भूत है तथा मानव जीवन के समग्र पहलू प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ही उसी एक केन्द्र के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। मनुष्य का अस्तित्व मानसिक संघर्ष से हुआ है, उसके विचारों ने उसका पंच भौतिक शरीर विनिर्मित किया है। अपनी मानसिक अवस्था के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपनी बेड़ियाँ दृढ़ करता है तथा अज्ञान तिमिर में आच्छन्न हो ठोकरें खाता फिरता है।

Oct 2, 2021

रामायण बाल कांड (Ramayan Baal Kand With Simple Explanation )

Bhagwat Geeta Saar

भगवान शिव के महतवपूर्ण रहस्य

 


आइये भगवान भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है के महतवपूर्ण रहस्य जानते हैं।

1.  सर्वप्रथम भगवान शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।

2. भगवान शिव के अस्त्र-शस्त्र अर्थात भगवान शिव का धनुष (पिनाक), चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

3. भगवान शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के  ही बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

4.  भगवान शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

5.  भगवान शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं - गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

6. भगवान शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही भगवान शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। भगवान शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। भगवान शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

7. भगवान शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी भगवान शिव का गण माना जाता है। 

8.  भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये भगवान शिव पंचायत कहलाते हैं।

9. भगवान शिव के द्वारपाल नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

10. जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि भगवान शिव के पार्षद हैं।

11. भगवान शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में भगवान शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। भगवान शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

12. ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

13. भगवान भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। भगवान शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

14. वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को भगवान शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी भगवान शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी भगवान शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग भगवान शिवलिंग अर्थात भगवान शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

15. भगवान शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।

16. श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में भगवान शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।

रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में भगवान शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर भगवान शिव के पदचिह्न हैं।

तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में भगवान शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास भगवान शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर भगवान शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।

17. वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि भगवान शिव के अवतार हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

18. भगवान शिव का विरोधाभासिक परिवार है क्योकि भगवान शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि भगवान शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन भगवान शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

19. भगवान शिव का निवास, ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर है। जहां पर भगवान शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। भगवान शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

20. ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी भगवान शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में भगवान शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

21. भगवान शिव की भक्ति हेतु भगवान शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। भगवान शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर भगवान शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

22.  भगवान शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

23. सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में भगवान शिव व्रत रखे जाते हैं। भगवान शिवरात्रि और महाभगवान शिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

24. भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (भगवान शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

25. भगवान शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। भगवान शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। भगवान शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर भगवान शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

26. दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी भगवान शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव भगवान शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

27.  भगवान शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन प्रचलित नाम - महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, भगवान शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

28. भगवान शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

29. वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, भगवान शिव पुराण और भगवान शिव संहिता में भगवान शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

30. वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद भगवान शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप भगवान शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

31.बारह ज्योतिर्लिंग हैं- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्म लिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो भगवान शिवलिंग के बारह खंड हैं। भगवान शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

 दूसरी मान्यता अनुसार भगवान शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।

32. भगवान शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले भगवान शिवभक्त हैं, क्योंकि भगवान शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व भगवान शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

33. भगवान शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- भगवान शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग भगवान शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को भगवान शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: भगवान शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी भगवान शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

 

34. देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी भगवान शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर भगवान शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए भगवान शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।