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Apr 30, 2025

उपनिषदों की दृष्टि से परमात्मा का स्वरूप और उसका साक्षात्कार

मनुष्य के जीवन में जब भी वह अपने अस्तित्व, सृष्टि और जीवन के उद्देश्य पर विचार करता है, तब उसका मन स्वाभाविक रूप से एक परम सत्ता की ओर आकर्षित होता है। यही सत्ता है — परमात्मा। लेकिन इस परमात्मा के स्वरूप, स्थान और उसके साथ मानव जीवन के संबंध को लेकर समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ और कल्पनाएँ व्याप्त हैं। कोई उसे साकार रूप में किसी विशेष स्थान में विराजमान मानता है, कोई उसे सातवें आसमान पर स्थित बताता है, तो कोई उसे केवल एक कल्पना या भावना कहकर नकार देता है। यह लेख इन भ्रांतियों का विश्लेषण करते हुए, उपनिषदों और महर्षि दयानन्द सरस्वती की दृष्टि से परमात्मा के वास्तविक स्वरूप और जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।

प्राचीन काल से लेकर आज तक विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों और मतों में परमात्मा के विषय में विभिन्न मत रहे हैं। कुछ उसे मूर्त रूप में मंदिरों में प्रतिष्ठित मानते हैं, कुछ उसे केवल एक शक्ति, तो कुछ केवल विचार या अनुभूति कहते हैं। कुछ मतावलम्बी उसे दूर किसी लोक या ब्रह्माण्ड के पार मानते हैं। इन कल्पनाओं का मूल कारण है — अल्पज्ञता।

मनुष्य जब आत्मज्ञान और ईश्वर ज्ञान से वंचित रहता है, तब वह अपनी सीमित बुद्धि और इन्द्रियों के आधार पर परम सत्य को समझने का प्रयास करता है। और तब वह उस सत्य को अपने ही जैसे किसी रूप में ढाल लेता है। परिणामस्वरूप परमात्मा का स्वरूप सीमित, स्थानिक और साकार मान लिया जाता है।

जब परमात्मा को एक मूर्ति, एक स्थान या एक काल विशेष में सीमित कर दिया जाता है, तो उसका सार्वभौमिक और सर्वव्यापी स्वरूप नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे विचारों से न केवल धर्म का पतन होता है, बल्कि घोर नास्तिकता भी पनपती है। जब मनुष्य परमात्मा को व्यावहारिक जीवन से काटकर किसी दैवी कल्पना तक सीमित कर देता है, तो उसका ध्यान केवल बाह्याचारों और अंधविश्वासों की ओर हो जाता है। इसका प्रभाव उसकी आन्तरिक उन्नति, चरित्र निर्माण और समाज में सदाचार के विकास पर भी पड़ता है।

उपनिषदों के सन्देशो में स्पष्ट  किया गया है कि परमात्मा कहाँ है.

ईशावास्य उपनिषद् का प्रथम मन्त्र अत्यन्त प्रसिद्ध है और इसमें परमात्मा के स्वरूप और जीवन के उद्देश्य को अत्यन्त संक्षेप, किन्तु सारगर्भित रूप में बताया गया है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

इस मन्त्र का भावार्थ है कि:

यह सम्पूर्ण जगत — जड़ और चेतन, स्थावर और जंगम — परमात्मा से व्याप्त है। वह ईश्वर इस संसार में कण-कण में है, उसी से यह सृष्टि अस्तित्व में है, वही इसका आधार है।

इसलिए मनुष्य को त्यागभाव से, अर्थात् मोह और लोभ से मुक्त होकर, इस संसार का उपभोग करना चाहिए।

यह विचार करना चाहिए कि जो वस्तुएँ हमें प्राप्त हैं, वे वस्तुतः हमारी नहीं हैं; वे किसी की निजी सम्पत्ति नहीं हैं।

अतः किसी वस्तु के प्रति लालच नहीं करना चाहिए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस मन्त्र की जो व्याख्या की है, वह अत्यन्त यथार्थ, वैज्ञानिक और व्यावहारिक है। वे लिखते हैं:

"(यत्) जो (इदम्) प्रकृति से लेकर पृथिवी-पर्यन्त (सर्वम्) सब (जगत्याम्) चलायमान सृष्टि में (जगत्) जड़-चेतन जगत् है, वह (ईशा) ईश्वर अर्थात् सकल ऐश्वर्य से सम्पन्न, सर्वशक्तिमान् परमात्मा के द्वारा (वास्य) आच्छादित अर्थात् सब ओर से अभिव्याप्त किया हुआ है। (तेन) इसलिए (त्यक्तेन) त्यागपूर्वक अर्थात् जगत् से चित्त को हटा के (भुंजीथाः) भोगों का उपभोग कर। (किं च) और (कस्यस्वित्) यह धन किसका है! अर्थात् किसी का नहीं, अतः किसी के भी (धनम्) धन अर्थात् वस्तुमात्र की (मा) मत (गृधः) अभिलाषा कर।"

इस भाष्य से यह स्पष्ट होता है कि परमात्मा कोई स्थानिक सत्ता नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। उसका अस्तित्व हर कण में है। उसका साक्षात्कार किसी विशेष स्थान पर नहीं, बल्कि अपने जीवन में संतुलन, त्याग और विवेक के माध्यम से किया जा सकता है।

5. परमात्मा का स्वरूप: उपनिषदों की दृष्टि से

उपनिषदों में परमात्मा के जिन गुणों और स्वरूप का वर्णन हुआ है, वे हैं:

सच्चिदानन्द स्वरूप: वह सत्य (नित्य), चित् (ज्ञानस्वरूप), और आनन्द (सुखस्वरूप) है।

अजन्मा और अनादि: वह न कभी जन्म लेता है, न ही उसका कोई आदि या अंत है।

निर्गुण, निराकार: वह रूप, रंग, गुण और आकार से परे है, किन्तु वह सभी गुणों का आधार है।

सर्वव्यापक और सर्वज्ञ: वह हर जगह है, सब कुछ जानता है, और सब पर न्याय करता है।

ईशावास्य उपनिषद् न केवल परमात्मा के स्वरूप को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि एक मनुष्य को जीवन में कैसे जीना चाहिए। उसमें कहा गया है कि:

जीवन को त्यागपूर्वक, लोभ रहित और संतुलन के साथ जीना चाहिए।

संसार में जो कुछ भी है, वह परमात्मा का है। हमें केवल उसका उपयोगकर्ता होना है, स्वामी नहीं।

इसलिए धन, पद, प्रतिष्ठा, वस्तुओं आदि के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

आज का समाज भौतिकवाद, उपभोक्तावाद और आत्मकेन्द्रित जीवनशैली की ओर तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय में उपनिषद का यह सन्देश अत्यन्त प्रासंगिक है। जब मनुष्य यह समझने लगेगा कि यह सम्पूर्ण जगत परमात्मा से व्याप्त है, तब वह हर वस्तु, हर प्राणी और हर मनुष्य के साथ सम्मान, करुणा और सेवा का भाव रखेगा।

यह दृष्टिकोण पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और वैश्विक शान्ति के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। यदि हम संसार को ईश्वर का स्वरूप मानें, तो हम उसका शोषण नहीं, बल्कि संरक्षण करेंगे।

परमात्मा को देखना, जानना या अनुभव करना — यह प्रत्येक साधक के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होता है। उपनिषदों और वैदिक परम्परा में इसे ब्रह्मसाक्षात्कार कहा गया है। यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव है जो मनुष्य को परम शान्ति, स्थिरता और आनन्द की ओर ले जाता है। लेकिन यह साक्षात्कार कैसे संभव है? इसका उत्तर वैदिक ज्ञान में तीन प्रमुख योगों के रूप में दिया गया है: ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग।

1. ज्ञानयोग (ब्रह्मविद्या का पथ)

ज्ञानयोग वह मार्ग है जिसमें मनुष्य विवेक और विचार के माध्यम से परमात्मा को जानने का प्रयास करता है। इस पथ में मुख्य साधन हैं:

शास्त्रों का अध्ययन: उपनिषद, वेद, गीता आदि ग्रंथों का मनन कर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना।

श्रवण, मनन, और निदिध्यासन: गुरु से श्रवण (सुनना), मनन (चिंतन) और निदिध्यासन (ध्यान) के द्वारा ज्ञान को जीवन में उतारना।

अहंकार का लोप: “मैं शरीर हूँ” इस भ्रांति को त्यागकर “मैं आत्मा हूँ, परमात्मा का अंश हूँ” यह अनुभव करना।

उपनिषदों में कहा गया है:

"नेति नेति" — वह यह नहीं है, वह वह नहीं है।

इसका अर्थ है कि परमात्मा इन्द्रियगम्य नहीं है, वह विचार और तर्क से परे है, लेकिन ज्ञान और ध्यान से आत्मा में उसका अनुभव संभव है।


2. कर्मयोग (निष्काम सेवा का मार्ग)

कर्मयोग का तात्पर्य है – कर्तव्य का पालन करते हुए परमात्मा की ओर बढ़ना। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा:

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
अर्थात् — "तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की आकांक्षा मत कर।"

कर्मयोग के मुख्य लक्षण:

निष्कामता: बिना किसी लोभ, लाभ या मोह के कर्म करना।

कर्तव्यनिष्ठा: जो भी कार्य हो, उसे ईश्वर को अर्पण समझकर करना।

सेवा-भाव: समाज, प्रकृति, और मानवता की सेवा को ईश्वर-सेवा मानकर करना।

कर्मयोग से मन शुद्ध होता है, अहंकार समाप्त होता है और अंततः मनुष्य भीतर से उस परम सत्ता की उपस्थिति को अनुभव करने लगता है।

3. भक्तियोग (प्रेम और समर्पण का मार्ग)

भक्तियोग हृदय की साधना है। यह मार्ग उन साधकों के लिए है जो प्रेम, श्रद्धा और समर्पण द्वारा परमात्मा के समीप जाना चाहते हैं। इस पथ की विशेषताएँ हैं:

श्रद्धा और विश्वास: परमात्मा के अस्तित्व और करुणा पर अटूट विश्वास।

प्रेममयी भक्ति: निराकार या साकार – किसी भी रूप में, पर प्रेमपूर्वक परमात्मा को पुकारना।

नम्रता और आत्मसमर्पण: अपने अहंकार को त्यागकर परमात्मा के चरणों में समर्पण करना।

उपनिषदों में कहा गया है:

“भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन”
अर्थात् — "ऐसी अनन्य भक्ति से ही मैं प्राप्त किया जा सकता हूँ।"

भक्तियोग में कोई विशेष योगबल या ज्ञानबल आवश्यक नहीं। केवल सरल हृदय, निर्मल मन और निःस्वार्थ प्रेम चाहिए।

तीनों योगों की एकता

हालाँकि ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग तीन अलग-अलग मार्ग प्रतीत होते हैं, परन्तु अंत में ये सब एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं — परमात्मा का साक्षात्कार।

ज्ञान बिना कर्म अंधा है, क्योंकि कर्म दिशा हीन हो जाता है।

कर्म बिना भक्ति रूखी है, क्योंकि भावना का अभाव हो जाता है।

भक्ति बिना ज्ञान अधूरा है, क्योंकि श्रद्धा के बिना ज्ञान शुष्क हो जाता है।

इसलिए एक संतुलित साधक तीनों योगों का समन्वय करता है — ज्ञान से दिशा पाता है, कर्म से सेवा करता है और भक्ति से समर्पण करता है।

परमात्मा कोई दूर बैठा राजा नहीं, जो सृष्टि को बाहर से संचालित कर रहा है। वह सृष्टि में ही है, सृष्टि उसी में है। उसका साक्षात्कार किसी विशेष स्थान या रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन में संतुलन, संयम, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलकर किया जा सकता है। उपनिषदों का यही सन्देश है और महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसी सत्य को सरल भाषा में हमें समझाया है।

यदि मानव समाज इस दृष्टिकोण को आत्मसात करे, तो न केवल उसका आध्यात्मिक उत्थान होगा, बल्कि वह सामाजिक, नैतिक और पर्यावरणीय संकटों से भी मुक्ति पा सकेगा।

वाणी उपनिषदों की, विचार महर्षि दयानन्द के, और पथ मानव जीवन के सार्थक निर्माण का का सार है।



परमात्मा कोई दूर बैठा हुआ राजा नहीं है जो सृष्टि को बाहर से निर्देश दे रहा हो। वह सर्वत्र व्याप्त है — कण-कण में, हृदय की गहराई में, विचारों की पवित्रता में, कर्म की निष्कलुषता में। वह सृष्टि से अलग नहीं, सृष्टि का सार है। उसी में सृष्टि समाहित है, और वही सृष्टि में प्रकट होता है।

उपनिषदों का यही गूढ़ सन्देश है — परमात्मा को पाने के लिए तीर्थों या मूर्तियों की नहीं, बल्कि सत्य, सेवा, संयम और समर्पण की आवश्यकता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसी उपनिषदिक सत्य को समाज के समक्ष एक जीवंत दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया — स्पष्ट, वैज्ञानिक, और व्यावहारिक।

यदि मानव समाज इस दृष्टिकोण को आत्मसात कर ले — कि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है, और प्रत्येक जीव उसी परमात्मा का अंश है — तो न केवल उसका आध्यात्मिक उत्थान संभव है, बल्कि वह सामाजिक विषमता, नैतिक पतन और पर्यावरणीय संकट जैसे आधुनिक संकटों से भी उबर सकता है। जब परमात्मा को हर जीव में देखा जाएगा, तब न हिंसा होगी, न शोषण, न भेदभाव।


यह  इस सत्य का संदेश है - वाणी उपनिषदों की है, विवेक महर्षि दयानन्द का है, और यह पथ है उस मानव जीवन का, जो आत्मा को परमात्मा से एक करने की क्षमता रखता है

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