राघव ने दूसरा द्वार पार कर लिया था।
अब उसके भीतर आत्मविश्वास था, लेकिन साथ ही एक अजीब-सा गर्व भी।
उसे लगता था—“मैंने भय को जीता,
मोह को हराया… अब मुझसे बड़ा साधक कौन
हो सकता है?”
यही गर्व उसकी यात्रा को नए जाल की ओर खींच रहा था।
एक शाम वह अस्सी घाट की ओर चला गया।
वहाँ छात्र, कवि, गायक, साधु–संत सब इकट्ठा
होते थे।
घाट पर अजनबी भी अपनों जैसा लगने लगता
था।
बाँसुरी की धुन, गीत, हँसी-मज़ाक… वातावरण जीवंत था।
कुछ युवकों ने राघव को देख लिया और बोले—
“भइया, आप नए लगते हैं। आइए, बैठिए।”
राघव उनके बीच बैठ गया।
बातों-बातों में उसने अपनी यात्रा का
ज़िक्र कर दिया।
“मैं सत्य की तलाश में हूँ। मैंने भय
और मोह के द्वार पार कर लिए हैं।”
युवक दंग रह गए।
किसी ने कहा— “वाह! आप तो बड़े साधक निकले।”
दूसरे ने कहा— “आपसे हमें भी कुछ सीखना चाहिए।”
राघव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
उसे लगा, लोग उसे सम्मान दे रहे हैं।
भीड़ की नज़रों में ऊँचा दिखने का सुख
उसे भाने लगा।
उस रात वह घाट पर बैठा सोच रहा था—
“साधु ने कहा था कि तीसरा द्वार
अहंकार का है…
लेकिन अहंकार कहाँ है?
मैं तो बस अपनी यात्रा बता रहा था।”
लेकिन भीतर से एक हल्की आवाज़ आई—
“क्या सचमुच तू बस बता रहा था?
या तुझे यह अच्छा लगा कि लोग तुझे
साधक मानें, तुझे सम्मान दें?”
राघव असहज हो गया।
क्या सचमुच उसके भीतर यह बीज पनप रहा
था?
अचानक वही साधु उसके सामने प्रकट हुए।
वे मुस्कराते नहीं थे, उनकी आँखों में कठोरता थी।
“बाबा, तूने भय और मोह तो
पार कर लिहलऽ।
बाकी अहंकार… उ सबसे कठिन बा।
डर और मोह साफ-साफ दिखेला, बाकिर अहंकार धीरे-धीरे चढ़ेला, जइसे जहर।
लोग तोके सम्मान देला, तू सोचऽता—‘हम काबिल बानी।’
एह भावना से सावधान होखऽ।”
राघव ने सिर झुका लिया।
“महाराज, मैं क्या करूँ?”
साधु बोले— “अहंकार से
लड़ना आसान ना बा।
एहमें तोरा खुदे के देखे के बा।
भीड़ के दरबार में मत फँसऽ।
खुद के दरबार में उतर, तब सच्चाई दिखी।”
अगले दिन घाट पर बड़ी आरती थी।
सैकड़ों लोग जमा थे।
मंत्रोच्चार, ढोल, शंख और दीपों की रोशनी ने पूरा वातावरण दिव्य बना दिया।
भीड़ में किसी ने राघव को पुकारा—
“भइया, आप भी आशीर्वाद दीजिए। आप साधक हैं।”
राघव चौंक गया।
लोग उसे सचमुच साधक मानने लगे थे।
उसने हाथ उठाकर आशीर्वाद देने की
कोशिश की।
भीतर से आवाज़ आई— “देखा, तू वही कर रहा है जिससे साधु ने मना किया था।”
लेकिन दूसरी आवाज़ आई—
“नहीं, मैं साधक हूँ। मैंने दो द्वार पार किए हैं।
मैं दूसरों से अलग हूँ।
यह आशीर्वाद देना गलत नहीं।”
उसके भीतर द्वंद्व शुरू हो गया।
अचानक उसे वही आकृति दिखी जो पहले भय और मोह में प्रकट हुई थी।
लेकिन इस बार उसका रूप अलग था।
उसने राजसी वस्त्र पहने थे, मुकुट था, और उसके चारों ओर लोग जयकारे कर रहे थे।
आकृति हँसकर बोली—
“राघव! अब तू महान है।
लोग तुझे पूजते हैं, मानते हैं।
यही है तेरी असली पहचान।
स्वीकार कर, तू खास है।”
राघव स्तब्ध रह गया।
आकृति उसके भीतर के अहंकार का रूप थी।
उसने काँपते हुए कहा—
“नहीं! मैं खास नहीं हूँ।
मैं भीड़ से अलग नहीं, उसी का हिस्सा हूँ।”
आकृति गरजी— “झूठ! तेरे मन
ने पहले ही मान लिया है कि तू अलग है।
तू डर और मोह को हराकर गर्व कर रहा
है।
यही है तेरी हार।”
राघव पसीने से भीग गया।
उसने साधु की आवाज़ याद की—
“अहंकार धीरे-धीरे चढ़ेला, जइसे जहर।”
उसने आँखें बंद कीं और भीतर उतरने लगा।
वहाँ उसने अपने आप को देखा—
भीड़ तालियाँ बजा रही है, लोग उसकी जय कर रहे हैं…
और वह मुस्करा रहा है।
उसने चिल्लाकर कहा—
“नहीं! यह मैं नहीं हूँ।
मैं कोई गुरु, कोई साधक नहीं।
मैं सिर्फ़ एक खोजी हूँ… जो खुद को
तलाश रहा है।”
अचानक वह दृश्य टूट गया।
भीड़ गायब हो गई।
आकृति चीखकर राख में बदल गई।
राघव ने आँखें खोलीं तो सामने एक नया दरवाज़ा प्रकट हुआ।
इस पर लिखा था—
“जिसने अहंकार को हराया,
वही आत्मा का प्रकाश देखेगा।”
राघव ने गहरी साँस ली।
उसने दरवाज़ा खोला।
भीतर से इतनी तीव्र रोशनी फैली कि
उसकी आँखें चौंधिया गईं।
वह जानता था कि अब अगला पड़ाव सबसे कठिन होगा।
रात का आसमान तारों से भरा था।
गंगा की लहरें चमक रही थीं।
राघव ने मन ही मन कहा—
“मैंने तीन द्वार पार कर लिए।
अब सिर्फ़ अंतिम द्वार बचा है—आत्मा
का प्रकाश।”
लेकिन उसे यह भी एहसास था कि अब तक की सारी यात्राएँ सिर्फ़ तैयारी थीं।
सच्ची परीक्षा अब आने वाली थी।
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