सुबह का सूरज गंगा के जल पर सोने की परत बिछा रहा था।
घाट पर रोज़ की तरह भीड़ थी—किसी के हाथ में आरती की थाली, किसी के हाथ में कलश, तो कोई मंत्र जपता हुआ डुबकी लगा रहा था।
लेकिन राघव की नज़र हर चेहरे को
छोड़कर एक ही चेहरे पर टिक जाती—गौरी।
गौरी सिर पर फूलों की टोकरी लिए लोगों को आवाज़ लगा रही थी—
“फूल ले लऽ बाबू! बिना फूल पूजा अधूरा
रही।”
उसकी आवाज़ में अपनापन था, जैसे वह हर आने-जाने वाले को पहचानती हो।
राघव ने महसूस किया कि उसकी सुबहें अब
गौरी से शुरू होती थीं।
राघव हर दिन उससे फूल लेता और थोड़ी-बहुत बातें करता।
गौरी की सादगी, उसकी हँसी,
और उसकी आँखों की चमक राघव के मन में
गहरी उतरने लगी थी।
एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा—
“गौरी, तुम रोज़ कितने बजे
से यहाँ आ जाती हो?”
गौरी ने हँसते हुए कहा—
“बाबू, हम त अँधियारे में
उठ जातानी।
माई फूल तोड़ेला, हम टोकरी
सजावनी।
फिर घाट पर आ जानी।
ई कामे से घर चलऽता।”
राघव चुपचाप सुनता रहा।
गौरी ने सहजता से कहा—
“हमरा जिनगी साधारण बा बाबू।
बाकी हम इहे चाहीले कि सब खुस रही।
गंगा मइया से रोज़ याचना करीले।”
उसके शब्द सरल थे, मगर
उनमें इतनी गहराई थी कि राघव को अपनी ही दुनिया नकली लगने लगी।
वह सोचने लगा—
“जिसे लोग अशिक्षित समझते हैं, वही जीवन का असली पाठ पढ़ा रही है।”
रात को वही साधु फिर उसके सामने आ खड़े हुए।
उनकी आँखें जैसे भीतर तक देख लेती थीं।
वे बोले—
“बाबा, मोह बढ़त जा रहल बा।
समझऽ, मोह रस लागेला,
बाकिर बाँध लेला।”
राघव ने विनम्रता से कहा—
“महाराज, मैं उससे सिर्फ़
बातें करता हूँ।
क्या यह गलत है?”
साधु ने कठोर स्वर में कहा—
“गलत–सही का प्रश्न ना बा।
प्रश्न बा कि तोहरे मन के डोर अब तोहार हाथ में बा कि ओकर मुस्कान में फँस गइल
बा।
याद रखऽ, मोह सुख देला,
बाकिर अंत में पीड़ा छोड़ेला।”
राघव चुप रह गया।
वह साधु की बात को झुठला नहीं सकता था, लेकिन उसका दिल मानने को तैयार भी नहीं था।
एक दिन गौरी फूल बेचकर खाली बैठी थी।
राघव पास जाकर बैठ गया।
गौरी ने अपनी कहानी बताई—
“हमरा बाबूजी बरिस पहले चल बसले।
माई फूल बेचके घर चलावेली।
हम छोट से ई काम कर रहल बानी।
कभी-कभी मन करेला पढ़ाई करि, बाकिर जिनगी ना चुटकी बजाके बदल जाला।”
उसकी आँखें कुछ पल के लिए भीग गईं।
फिर उसने खुद को सँभाला और मुस्कराकर बोली—
“बाकी, रोइले से का होई?
जीवन हँसी में बितावल बड़का तपस्या ह।”
राघव उस क्षण पूरी तरह उसके मोह में डूब गया।
उसे लगा—गौरी केवल एक लड़की नहीं, बल्कि जीवन की कठोर सच्चाई और मासूम आशा का प्रतीक है।
उस रात राघव घाट पर देर तक बैठा रहा।
गंगा की लहरें अंधेरे में रहस्यमयी लग
रही थीं।
अचानक उसे वही लाल आँखों वाली आकृति दिखी, जो पहले भय के समय प्रकट हुई थी।
लेकिन इस बार उसका रूप अलग था—
उसकी आँखों में मोहक चमक थी, और उसके हाथ में फूलों की माला।
आकृति ने कहा—
“राघव… तूने भय पार कर लिया।
लेकिन मोह से बच नहीं पाएगा।
यह माला तेरी है।
इसे पहन ले… और गौरी सदा तेरे साथ होगी।”
राघव का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वह जानता था कि यह परीक्षा है।
गौरी का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमने लगा—उसकी मुस्कान, उसकी बातें, उसकी मासूमियत।
लेकिन तभी साधु की आवाज़ हवा में गूँजी—
“बाबा, मोह सुख देला,
बाकिर मुक्ति रोक लेला।
सोचऽ, तोहरे यात्रा काहे
खातिर बा?”
राघव काँप उठा।
वह चाहता था कि गौरी उसके जीवन में बनी रहे।
लेकिन क्या इसके लिए वह अपनी आत्मा की मुक्ति का मार्ग छोड़ देगा?
उसने आँखें बंद कर लीं और भीतर की आवाज़ सुनी।
उसके दिल ने कहा—
“प्रेम सुंदर है, लेकिन
मुक्ति का मार्ग अलग है।
गौरी जीवन का एक फूल है, लेकिन
मैं उस पर अधिकार नहीं कर सकता।”
उसने आकृति से कहा—
“नहीं! मैं इस माला को नहीं लूँगा।
गौरी मेरे जीवन की सच्चाई है, लेकिन वह मेरे मोह का जाल नहीं बनेगी।
मैं मोह से बँधकर जीना नहीं चाहता।”
अचानक वह आकृति चिल्लाई और धुएँ में विलीन हो गई।
उसकी जगह एक स्वर्णिम द्वार प्रकट हुआ।
द्वार पर लिखा था—“मोह से मुक्त वही आगे बढ़े।”
राघव ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
भीतर से प्रकाश की बाढ़ निकली।
उसने गहरी साँस ली और भीतर कदम रख दिया।
राघव अब दो द्वार पार कर चुका था।
भय और मोह—दोनों से लड़कर उसने खुद को संभाला।
लेकिन उसे यह भी पता था कि आगे की राह और कठिन होगी।
साधु की बात याद आई—
“तीसरा द्वार अहंकार के बा… और ई सबसे भारी बा।”
राघव ने गंगा की ओर देखा।
लहरें मानो कह रही थीं—
“आगे बढ़, अभी और सीखना
बाकी है।”
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