May 26, 2026

काशी के चार द्वार - 6 - तीसरा द्वार – अहंकार का विसर्जन

 गंगा के घाट पर रात का सन्नाटा पसरा हुआ था।

राघव अकेला बैठा था।
तीसरे द्वार की झलक तो उसे मिल चुकी थी, लेकिन वह अब भी भीतर एक भारीपन महसूस कर रहा था।

वह सोच रहा था—
भय और मोह तो मैंने जीत लिए।
लेकिन अहंकार… यह तो बार-बार लौट आता है।
कभी भीड़ की तालियों में, कभी लोगों की नज़रों में, कभी अपनी ही सोच में।”

उसके मन में प्रश्न गूंज रहा था—
क्या मैं सचमुच अहंकार से मुक्त हो सकता हूँ?”

अचानक वही वृद्ध साधु उसके सामने प्रकट हुए।
इस बार उनका चेहरा गंभीर था, आँखें तेज़।

वे बोले—
बाबा, अहंकार सबसे चालाक दुश्मन बा।
ई तो उ साँप ह जे अपना ही आँगना में लुकेला।
तोहरा भीतर भी उ साँप बा।”

राघव ने सिर झुका लिया।
महाराज, मैं समझ नहीं पा रहा।
मैं भीड़ से दूर रहता हूँ, किसी से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं करता… फिर भी अहंकार कहाँ है?”

साधु ने कठोर स्वर में कहा— तोहरा मन में ई भाव बा कि ‘मैंने भय और मोह को जीत लिया।’
यही अहंकार ह।
जब आदमी कहे—‘मैं जीतल हई’—तब उ हारल ह।
साधक जब तक अपने को जीतने वाला समझेला, तब तक बंधन में बा।”

राघव काँप उठा।
वह समझ गया—
उसका “मैंने किया” ही सबसे बड़ा जाल है।

उस रात उसने आँखें बंद कर ध्यान लगाया।
धीरे-धीरे उसकी सांसें स्थिर हुईं और वह भीतर उतरने लगा।

उसने खुद को भीड़ के बीच देखा।
लोग उसकी जय-जयकार कर रहे थे।
किसी ने कहा—“यह साधक है, जिसने तीन द्वार पार किए हैं।”
दूसरा बोला—“यह गुरु है, यह संत है।”

राघव गर्व से मुस्कराया।
उसे अच्छा लगा।
लेकिन उसी क्षण भीतर से आवाज़ आई—
देखा, यही तो अहंकार है।
तू अब खुद को गुरु मान रहा है, जबकि तू अभी भी साधक ही है।”

उसके कानों में गूंज उठा—
जब तक ‘मैं’ बचा है, तब तक मुक्ति नहीं।”

अचानक उसके सामने वही आकृति प्रकट हुई।
इस बार उसका रूप और भी भव्य था—
सोने का सिंहासन, हाथ में राजदंड, सिर पर मुकुट, और हजारों लोग उसकी आरती उतार रहे थे।

आकृति गरजी—
राघव! तू अब साधारण इंसान नहीं।
तूने भय हराया, मोह हराया…
अब तू राजा है साधकों का, तू गुरु है सबका।
स्वीकार कर, यही तेरी पहचान है।”

राघव पसीने से भीग गया।
आकृति उसकी ओर राजदंड बढ़ाकर बोली—
ले! इसे थाम ले और राजा बन जा।
लोग तुझे पूजेंगे, तुझे याद रखेंगे।
यही तेरा भाग्य है।”

तभी गंगा की लहरों की गर्जना सुनाई दी।
मानो वे कह रही हों—
अरे मूर्ख! खुद को राजा मानता है?
राजा कौन? वही जो सबका सेवक है।
तू सेवक बने बिना साधक नहीं बन सकता।”

राघव काँप उठा।
उसने अपने भीतर कहा—
नहीं! मैं गुरु नहीं, मैं राजा नहीं।
मैं तो बस एक खोजी हूँ।”

लेकिन आकृति हँसी।
यह झूठ है! तेरे दिल को तालियाँ भाती हैं।
तू भीड़ से अलग दिखना चाहता है।
यही अहंकार है।”

राघव रो पड़ा।
उसने चीखते हुए कहा— हाँ! मैं चाहता था कि लोग मुझे साधक मानें। मैं चाहता था कि मुझे सम्मान मिले। मुझे गर्व था कि मैंने द्वार पार किए।
लेकिन अब मैं इसे त्यागता हूँ।
मैं कुछ नहीं हूँ! न साधक, न गुरु, न विजेता—मैं बस एक यात्री हूँ।” यह कहते ही उसके भीतर कुछ टूट गया। जैसे बर्फ़ पिघल गई हो, जैसे भारी बोझ उतर गया हो।

आकृति अचानक कांपने लगी।
उसका मुकुट गिर गया, राजदंड टूट गया।
वह राख में बदल गई और गंगा की हवा में विलीन हो गई।

राघव ने देखा—उसके सामने तीसरा द्वार प्रकट हुआ।
इस पर लिखा था—
जिसने ‘मैं’ को विसर्जित किया, वही आत्मा को देखेगा।”

राघव ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
भीतर से उज्ज्वल प्रकाश निकला— इतना तेज़ कि उसकी आँखें चौंधिया गईं।

वह उस प्रकाश में डूब गया।
उसे लगा, जैसे वह स्वयं प्रकाश बन गया है।

जब उसने आँखें खोलीं तो गंगा उसके सामने शांत बह रही थी।
उसका मन हल्का था, जैसे किसी ने सारे बोझ उतार दिए हों।
उसने मुस्कराकर कहा— अब मुझे समझ आया… मुक्ति का मार्ग ‘मैं’ को खोने से गुजरता है।”

तीन द्वार पार हो चुके थे।
अब सिर्फ़ एक अंतिम द्वार बचा था—आत्मा का प्रकाश

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