May 26, 2026

काशी के चार द्वार - 3 - गौरी की मुस्कान – मोह का आरंभ

सुबह का समय था।

राघव पूरी रात बेचैन रहा, लेकिन उसे एक संतोष था कि उसने पहला द्वार पार कर लिया।

अब वह घाट की सीढ़ियों पर बैठकर गंगा स्नान करने वालों को देख रहा था।

सूरज की पहली किरणें पानी पर पड़ते ही सोने जैसी चमक बिखेर रही थीं।

घाट पर हलचल बढ़ गई थी—किसी के हाथ में फूलों की टोकरी, किसी के हाथ में दिया, कोई आरती कर रहा था, कोई हँसी-मज़ाक में डुबकी लगा रहा था।

भीड़ में अचानक उसकी नज़र एक लड़की पर ठहर गई।

वह फूल बेच रही थी।
उसकी उम्र मुश्किल से बाईस–तेइस होगी।

आँखों में गहराई थी, चेहरे पर सहज मासूमियत।

सिर पर फूलों की टोकरी लिए वह राहगीरों को पुकार रही थी—

फूल ले लऽ बाबू! गंगा मइया के चढ़ावा बिना पूजा अधूरा रही।”

राघव की नज़र उससे हट न सकी।

वह जानता था यह सिर्फ़ संयोग है, पर भीतर कहीं हल्की-सी हलचल उठी।

लड़की उसकी ओर बढ़ी और मुस्कराकर बोली—

बाबू, फूल ले लऽ। पूजा बिना फूल अधूरा होई।”

राघव चौंका।
हाँ… हाँ… दे दो।”

उसने झोली से पैसे निकाले और टोकरी से फूल ले लिए।

लड़की ने ध्यान से उसकी आँखों में देखा और मुस्कराई।

उस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि राघव का दिल एक पल को ठहर गया।

वह बोली—

पहली बेर आइल बाड़ऽ का?”

राघव ने सिर हिलाया।

हाँ, पहली बार।”

लड़की ने कहा—

त तब जानऽ कि गंगा मइया तोहरे खातिर खुद बुलवली हउवें।”

यह कहते हुए उसकी आँखों में विश्वास और श्रद्धा की चमक थी।

राघव के भीतर कुछ हिल गया।

गंगा ने मुझे बुलाया है?” वह सोचने लगा।

शायद यह सच ही था।

राघव ने हिम्मत जुटाकर पूछा—

तुम्हारा नाम क्या है?”

लड़की हल्के से हँस पड़ी।

का करीह नाम जान के बाबू?

फूल बेचाई, बस ई काम बा।”

राघव ने फिर कहा—

फिर भी बताओ… मुझे जानना है।”

लड़की ने धीरे से कहा—

गौरी।”

नाम सुनते ही राघव के मन में बिजली-सी कौंध गई।

गौरी… भोलेनाथ की अर्धांगिनी का नाम।

क्या यह संयोग था या कोई संदेश?

उस दिन से राघव रोज़ सुबह घाट पर आता और गौरी से फूल लेता।

गौरी हर बार मुस्कराकर उसे देखती और कुछ न कुछ कह देती।
कभी मज़ाक में—

बाबू, गंगा में डुबकी लगावतानी कि सिरिफ़ सोचतानी?”

कभी गंभीर होकर—

मन भारी लागे त गंगा के गोदी में रो लऽ, सब ठीक हो जाई।”

राघव समझ नहीं पा रहा था कि उसके भीतर क्या हो रहा है।

वह मानता था कि उसकी यात्रा आत्मा की खोज के लिए है, लेकिन गौरी की मासूम मुस्कान उसके मन में कुछ और ही भाव जगाने लगी थी।

वह अपने आप को रोक नहीं पा रहा था।

एक दिन पूजा के बाद राघव लौटा तो गौरी भी अपने टोकरे के साथ उसी गली से जा रही थी।

राघव ने सोचा—“क्यों न आज उससे बातें करूँ।”

वह उसके साथ-साथ चल पड़ा।

गौरी ने हँसते हुए कहा—

का बाबू, अब त लगऽता रोज़े हमर पाछे पाछे चलीं?”

राघव हड़बड़ा गया—

नहीं… मेरा मतलब है… बस रास्ता एक ही है।”

गौरी खिलखिलाकर हँस पड़ी।

बड़ा झूठ बोलऽता। आँख सब बता देला।”

उसकी हँसी में कोई बनावट नहीं थी, कोई छल नहीं।

सिर्फ़ सहजता।

लेकिन वही सहजता राघव के दिल में गहरी उतरने लगी।

रात को जब राघव घाट पर बैठा था, तो वही वृद्ध साधु फिर प्रकट हुए।

उन्होंने गहरी नज़र से राघव को देखा और बोले—

बाबा, तू मोह के जाल में फँसत बाड़ऽ।”

राघव चौंका।
महाराज, मैंने कुछ गलत तो नहीं किया…”

साधु ने गंभीर स्वर में कहा—

गलत सही के सवाल ना ह।

लेकिन याद रखऽ—दूसरा द्वार मोह के बा।

अगर ई मोह से निकल ना पवलऽ, त आगेला ना।”

राघव के दिल पर चोट लगी।

क्या सचमुच वह मोह में बंध रहा है?

गौरी तो मासूम है, उसकी बातें पवित्र हैं…

फिर भी, उसके बिना दिन अधूरा क्यों लगता है?

उस रात राघव देर तक सो नहीं पाया।

एक ओर साधु की चेतावनी गूँज रही थी, दूसरी ओर गौरी की मुस्कान।

वह खुद से कह रहा था—

मैं यहाँ मुक्ति खोजने आया हूँ… फिर यह मोह क्यों?”

लेकिन मन जवाब देता—

क्या मुक्ति बिना प्रेम के संभव है?

क्या गौरी केवल एक इंसान है या काशी का ही एक रूप, जो मुझे कुछ सिखाने आई है?”

सुबह होते ही वह फिर घाट पर पहुँचा।

गौरी पहले से मौजूद थी।

आज उसकी मुस्कान और भी गहरी थी।

राघव का दिल धड़क उठा।

उसने मन ही मन सोचा—

शायद यही दूसरा द्वार है।

मोह का द्वार।

और मुझे इसे पार करना ही होगा।”


 

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