अ–उ–म्, तुरीय अवस्था और ब्रह्म का अनुभव
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म।"
— भगवद्गीता (8.13)
अब तक हमने क्या जाना?
पिछले भाग में हमने देखा कि—
ॐ कोई सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि प्रणव है।
वेदों का सार ॐ है।
उपनिषदों ने इसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक कहा।
ऋषियों ने इसे बनाया नहीं, बल्कि समाधि में अनुभव किया।
अब प्रश्न उठता है—
यदि ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, तो इसके तीन अक्षर अ–उ–म् ही क्यों?
ऋषियों ने किसी अन्य ध्वनि को क्यों नहीं चुना?
इसका उत्तर हमें माण्डूक्य उपनिषद, भगवद्गीता, योग, वेदान्त और तंत्र—सभी में मिलता है।
अ–उ–म् : केवल तीन अक्षर नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि का विज्ञान
सामान्यतः लोग सोचते हैं—
अ + उ + म = ॐ
किन्तु ऋषियों के लिए यह मात्र ध्वनि-विज्ञान नहीं था।
यह सम्पूर्ण कॉस्मिक प्रक्रिया (Cosmic Process) का प्रतीक था।
"अ" – सृष्टि का उदय
जब बच्चा जन्म लेता है, तो उसके मुख से सहज निकलने वाली पहली ध्वनि प्रायः "अ" होती है।
क्यों?
क्योंकि "अ" सबसे स्वाभाविक ध्वनि है।
मुख पूर्णतः खुला रहता है।
कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
संस्कृत वर्णमाला का पहला अक्षर भी "अ" है।
इसीलिए ऋषियों ने कहा—
सृष्टि का आरम्भ भी "अ" है।
यह केवल भाषा नहीं, दर्शन है।
"अ" का अर्थ है—
आरम्भ
उत्पत्ति
जागरण
विस्तार
अभिव्यक्ति
इसी कारण "अ" को ब्रह्मा से जोड़ा गया।
ब्रह्मा किसी व्यक्ति विशेष का नाम मात्र नहीं, बल्कि सृजन-शक्ति का प्रतीक हैं।
जब भी कोई नई संभावना जन्म लेती है, वहाँ "अ" कार्य कर रहा होता है।
"उ" – संरक्षण और विकास
अब उत्पत्ति हो चुकी।
यदि उसका पालन न हो, तो सृष्टि टिकेगी कैसे?
इसलिए दूसरा चरण है—
उ।
ध्वनि भी "अ" से ऊपर उठती है।
जैसे जीवन आगे बढ़ता है।
"उ" का अर्थ है—
उन्नति
उत्कर्ष
संरक्षण
संतुलन
विस्तार
इसीलिए इसे विष्णु-तत्त्व का प्रतीक माना गया।
विष्णु केवल देवता नहीं हैं।
वे धारण करने वाली शक्ति हैं।
जिस शक्ति के कारण ग्रह अपनी कक्षा में हैं।
परमाणु स्थिर हैं।
जीवन चलता रहता है।
"म्" – समापन नहीं, रूपान्तरण
अधिकांश लोग "संहार" शब्द से डरते हैं।
किन्तु भारतीय दर्शन में संहार का अर्थ "नष्ट कर देना" नहीं है।
बल्कि—
एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश।
बीज समाप्त होता है—
वृक्ष बनता है।
सूर्य अस्त होता है—
नई सुबह आती है।
शरीर समाप्त होता है—
आत्मा नहीं।
इसीलिए "म्" का सम्बन्ध शिव से है।
शिव मृत्यु नहीं हैं।
शिव परिवर्तन हैं।
फिर मौन क्यों?
यहीं अधिकांश लोग रुक जाते हैं।
वे केवल "ॐ" बोलते हैं।
किन्तु ऋषि कहते हैं—
सबसे महत्वपूर्ण भाग ध्वनि नहीं—
ध्वनि के बाद का मौन है।
ध्यान से सुनिए।
जब आप धीरे-धीरे उच्चारण करते हैं—
अऽऽऽ...
ऊऽऽऽ...
म्म्म्म्म...
फिर क्या बचता है?
पूर्ण मौन।
ऋषि कहते हैं—
वही ब्रह्म है।
ध्वनि समाप्त हो जाती है।
किन्तु चेतना रहती है।
यही तुरीय है।
माण्डूक्य उपनिषद का महान रहस्य
केवल बारह मंत्रों वाला यह उपनिषद सम्पूर्ण वेदान्त का सार है।
यह कहता है—
मानव जीवन चार अवस्थाओं में चलता है।
पहली अवस्था – जाग्रत
यह वह अवस्था है जिसमें हम अभी हैं।
आँखें खुली हैं।
मन बाहर की दुनिया देख रहा है।
शरीर सक्रिय है।
उपनिषद इसे वैश्वानर कहता है।
इसका प्रतीक है—
अ
दूसरी अवस्था – स्वप्न
आँखें बन्द हैं।
किन्तु अनुभव चल रहा है।
मन स्वयं संसार रचता है।
इसे तैजस कहा गया।
इसका प्रतीक— उ
तीसरी अवस्था – सुषुप्ति
न स्वप्न।
न विचार।
न संसार।
फिर भी अस्तित्व है।
जब उठते हैं तो कहते हैं—
"आज बहुत अच्छी नींद आई।"
अर्थात् कोई तो था जिसने उस शांति का अनुभव किया।
यह अवस्था है—
प्राज्ञ।
इसका प्रतीक— म्
चौथी अवस्था – तुरीय
अब उपनिषद एक ऐसी बात कहता है जिसने सम्पूर्ण विश्व-दर्शन को बदल दिया।
वह कहता है—
चौथी अवस्था कोई "अवस्था" नहीं है।
वह जाग्रत नहीं।
स्वप्न नहीं।
सुषुप्ति नहीं।
फिर क्या?
वह वह चेतना है—
जो इन तीनों को देख रही है।
उसे ही कहा गया—
तुरीय।
न वह जन्म लेती है।
न मरती है।
न बदलती है।
यही आत्मा है।
यही ब्रह्म है।
यही ॐ का मौन भाग है।
आदि शंकराचार्य की अद्भुत व्याख्या
आदि शंकराचार्य लिखते हैं—
जब साधक "अ" का ध्यान करता है—
तो वह जगत को समझता है।
जब "उ" का ध्यान करता है—
तो सूक्ष्म जगत को जानता है।
जब "म्" का ध्यान करता है—
तो कारण अवस्था में प्रवेश करता है।
किन्तु जब मौन में स्थित हो जाता है—
तब जानता है—
मैं ब्रह्म हूँ।
यही अद्वैत है।
गौड़पादाचार्य का अजातिवाद
आदि शंकराचार्य के गुरु के गुरु थे—
महर्षि गौड़पाद।
उन्होंने माण्डूक्य पर कारिका लिखी।
वे कहते हैं—
वास्तव में संसार कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं।
जो उत्पन्न दिखाई देता है—
वह केवल चेतना का अनुभव है।
इसलिए ॐ का ध्यान संसार से भागना नहीं है।
बल्कि यह जानना है—
कि सम्पूर्ण जगत उसी चेतना की अभिव्यक्ति है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का प्रणव
श्रीकृष्ण कई स्थानों पर प्रणव का उल्लेख करते हैं।
अध्याय 7
"प्रणवः सर्ववेदेषु।"
अर्थात्—
मैं सभी वेदों में प्रणव हूँ।
ध्यान दीजिए— श्रीकृष्ण यह नहीं कहते—
"मैं प्रणव का निर्माता हूँ।"
वे कहते हैं—
मैं ही प्रणव हूँ।
अर्थात् परम चेतना और प्रणव अलग नहीं।
अध्याय 8
श्रीकृष्ण कहते हैं— जो साधक अन्तिम समय में—
ॐ का स्मरण करते हुए
परमात्मा का चिन्तन करता है—
वह परम गति प्राप्त करता है।
इसका अर्थ केवल मृत्यु के समय "ॐ" बोल देना नहीं है।
बल्कि सम्पूर्ण जीवन उसी चेतना में स्थित होना है।
अध्याय 10
भगवान कहते हैं—
"अक्षराणामकारोऽस्मि।"
अर्थात्—
अक्षरों में मैं "अ" हूँ।
क्यों?
क्योंकि "अ" सम्पूर्ण ध्वनि का मूल है।
जैसे ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है।
योगसूत्र में प्रणव
महर्षि पतञ्जलि ने केवल दो सूत्रों में प्रणव का सम्पूर्ण योग-विज्ञान दे दिया।
तस्य वाचकः प्रणवः।
ईश्वर का वाचक—प्रणव है।
फिर कहते हैं—
तज्जपस्तदर्थभावनम्।
केवल जप नहीं।
उसके अर्थ का भी चिन्तन।
यदि कोई केवल ध्वनि दोहराता रहे—
तो वह प्रारम्भ है।
किन्तु जब ध्वनि के अर्थ में मन डूब जाता है—
तभी वास्तविक ध्यान प्रारम्भ होता है।
अब तक हमने जाना कि "अ–उ–म्" केवल उच्चारण नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना और आत्मबोध का संपूर्ण मानचित्र है। ध्वनि से मौन तक की यात्रा ही साधना है। ऋषियों ने इसे किसी संप्रदाय का प्रतीक नहीं, बल्कि उस सत्य का संकेत माना जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
No comments:
Post a Comment