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Jul 9, 2026

Religious World: आध्यात्मिकता के ज्ञान से जाने रोग तथा व्याधि का मनोवैज्ञानिक पहलू



आध्यात्मिकता ज्ञान से जाने रोग तथा व्याधि का मनोवैज्ञानिक पहलू

मनुष्य का मन जगत नियन्ता का एक अद्भुत आश्चर्य है, वही समस्त जड़ चेतन का कारण भूत है तथा मानव जीवन के समग्र पहलू प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ही उसी एक केन्द्र के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। मनुष्य का अस्तित्व मानसिक संघर्ष से हुआ है, उसके विचारों ने उसका पंच भौतिक शरीर विनिर्मित किया है। अपनी मानसिक अवस्था के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपनी बेड़ियाँ दृढ़ करता है तथा अज्ञान तिमिर में आच्छन्न हो ठोकरें खाता फिरता है।

गायत्री महा मंत्र - भावार्थ एवं महत्व (Gayatri Maha mantra – Meaning & importance)

 गायत्री महामंत्र - भावार्थ एवं महत्व https://youtu.be/Bk2DMboRWfo


गायत्री महा मंत्र  - ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। 

गायत्री मंत्र का अर्थ : पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करे।

Jul 8, 2026

युग निर्माण सत्संकल्प: व्यक्तित्व और समाज के उत्थान के लिए 18 सूत्रों की विस्तृत व्याख्या



युग निर्माण सत्संकल्प: व्यक्तित्व और समाज के उत्थान के लिए 18 सूत्रों की विस्तृत व्याख्या

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्रतिपादित "युग निर्माण सत्संकल्प" एक ऐसा वैचारिक घोषणापत्र है, जो व्यक्ति के आत्म-परिवर्तन से समाज और युग के रूपांतरण की दिशा दिखाता है। इन अठारह संकल्पों को केवल वचन या नियम की तरह नहीं, बल्कि जीवनशैली की आत्मा मानकर अपनाना चाहिए। यह आलेख प्रत्येक सत्संकल्प को व्यावहारिक उदाहरणों, परिवारिक जीवन से जुड़ी सजीव स्थितियों और समाज सुधार के परिप्रेक्ष्य में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करता है। 

धर्म एक महासागर - भगवान बुद्ध

 


धर्म का आचरण पर स्वामी विवेकानन्दजी का विचार

आइए जानते है धर्म का आचरण पर स्वामी विवेकानन्दजी का विचार

स्वामी विवेकानन्द बताते है कि आप यह अच्छी तरह समझे कि किसी धर्म-पुस्तक का पाठ करने अथवा उसमें लिखी हुई धर्म विधियों की कवायद करने से ही कोई धार्मिक नहीं हो सकता। किसी धर्म या धर्म-पुस्तक पर विश्वास करने से ही यह ‘जन्म सार्थक नहीं होगा’ बल्कि उसमें बताये हुए मार्गों का अनुभव करना चाहिये।

‘जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे धन्य हैं, वे ईश्वर को देख सकेंगे ।’ परमेश्वर का साक्षात्कार करना ही मुक्ति है। कुछ मन्त्र रट लेने या मन्दिरों में शब्दाडम्बर करने से मुक्ति नहीं मिलती,परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य साधन कुछ काम नहीं आते, उसके लिये आन्तरिक सामग्री की जरूरत है।

Jun 16, 2026

ॐ (प्रणव) का रहस्य – वेदों, उपनिषदों और ऋषियों की दृष्टि से भाग–2

 अ–उ–म्, तुरीय अवस्था और ब्रह्म का अनुभव

"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म।"
— भगवद्गीता (8.13)

अब तक हमने क्या जाना?

पिछले भाग में हमने देखा कि—

  • ॐ कोई सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि प्रणव है।

  • वेदों का सार ॐ है।

  • उपनिषदों ने इसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक कहा।

  • ऋषियों ने इसे बनाया नहीं, बल्कि समाधि में अनुभव किया।

अब प्रश्न उठता है—

यदि ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, तो इसके तीन अक्षर अ–उ–म् ही क्यों?

ऋषियों ने किसी अन्य ध्वनि को क्यों नहीं चुना?