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Jun 15, 2026

शास्त्रों के अनुसार आदर्श पति के 7 गुण | महाभारत, रामायण और मनुस्मृति क्या कहते हैं?


शास्त्रों के अनुसार आदर्श पति के 7 गुण | महाभारत, रामायण और मनुस्मृति क्या कहते हैं?

सनातन धर्म में विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। पति और पत्नी को जीवन-रूपी रथ के दो पहियों की उपमा दी गई है। जिस u धर्मग्रंथों में आदर्श पत्नी के गुणों का वर्णन मिलता है, उसी प्रकार आदर्श पति के कर्तव्यों और गुणों का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है।

Jun 3, 2026

सुंदरता का आनंद या आसक्ति? क्यों कुछ लोग लालायित हो जाते हैं और कुछ नहीं — आध्यात्मिकता और विज्ञान का गहन विश्लेष



कल्पना कीजिए कि दो व्यक्ति किसी अत्यंत सुंदर पर्वतीय स्थान पर खड़े हैं। सामने बर्फ से ढकी चोटियाँ हैं, शीतल हवा बह रही है और चारों ओर अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य फैला हुआ है।

पहला व्यक्ति उस दृश्य को देखकर अत्यंत आनंदित होता है। उसके मन में तुरंत विचार आता है कि काश वह यहाँ अधिक समय रह पाता। वापस लौटने के बाद भी वह बार-बार उसी अनुभव को याद करता है और पुनः उसे पाने की इच्छा करता है।

दूसरा व्यक्ति भी वही दृश्य देखता है। उसे भी अच्छा लगता है। वह भी उस क्षण का आनंद लेता है। लेकिन उसके भीतर कोई विशेष लालसा उत्पन्न नहीं होती। यदि वह स्थान फिर कभी न मिले तो भी वह विशेष रूप से व्यथित नहीं होता।

Jul 5, 2025

त्रैलंग स्वामी : जीवन और दर्शन (Trailanga Swami: Life and Philosophy)

भारतीय साधना परंपरा में जिन महायोगियों और सिद्ध संतों की ख्याति चमत्कार, तप और ब्रह्मज्ञान के कारण दूर-दूर तक फैली, उनमें त्रैलंग स्वामी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वाराणसी में लगभग डेढ़ शताब्दी तक सक्रिय रहकर उन्होंने जो आध्यात्मिक प्रभाव छोड़ा, वह आज भी भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।

त्रैलंग स्वामी के जीवन से जुड़ी घटनाएँ साधारण मानव-बुद्धि की सीमाओं को लांघती प्रतीत होती हैं। उनके दीर्घायु होने के दावे, गंगा में घंटों जल-समाधि, विषपान के बाद भी जीवित रहना, पानी पर चलना, और उनके द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत का जीवन्त अनुशीलन – ये सब उनके व्यक्तित्व को रहस्यात्मक और चमत्कारमय बनाते हैं।

यह शोधात्मक निबंध त्रैलंग स्वामी के जीवन, साधना, दार्शनिक विचारधारा, चमत्कारों और उनसे जुड़ी लोककथाओं का विस्तृत विवेचन करता है। साथ ही इसमें उनके ऐतिहासिक महत्व और आधुनिक भारतीय अध्यात्म में उनके स्थान का भी विश्लेषण किया गया है।

✦ जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

त्रैलंग स्वामी का जन्म दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के विजयनगरम ज़िले के होलीया या होलिया नामक ग्राम में हुआ था। उनके जन्म का काल निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, लेकिन सामान्यतः उन्हें 15वीं–16वीं शताब्दी का माना जाता है। कुछ लोककथाओं में उनका जन्म 1600 या उससे भी पहले बताया जाता है। उनके माता-पिता धार्मिक और संस्कारी ब्राह्मण परिवार से थे।

उनके पिता का नाम नरसिंह शास्त्री था। वे वेद-पुराण के विद्वान, प्रतिष्ठित आचार्य और धार्मिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ थे। उनकी माता का नाम विद्यावती था। माता अत्यंत भक्त और साध्वी स्वभाव की थीं। परिवार में समृद्धि थी, लेकिन उसमें धार्मिक शुचिता और आध्यात्मिक आचार का पालन होता था।

शिवराम (जो आगे चलकर त्रैलंग स्वामी कहे गए) बचपन से ही गंभीर, विचारशील और ध्यान में तल्लीन रहने वाले थे। उनके बारे में कहा जाता है कि बचपन में ही वे घंटों समाधि-जैसी स्थिति में बैठ जाया करते थे और सांसारिक खेलकूद से उन्हें कोई आकर्षण न था। माता-पिता ने उनके ऐसे स्वभाव को भगवान शिव की कृपा का संकेत माना।

✦ बाल्यकालीन घटनाएँ

लोक-परंपरा में एक कथा मिलती है कि एक बार बालक शिवराम नदी किनारे बैठकर ध्यान कर रहे थे। गांव के लोग उन्हें ढूंढते हुए वहाँ पहुँचे, तो देखा कि उन पर सर्प लिपटा हुआ है, किंतु बालक निश्चल बैठे हैं। यह देखकर लोग भयभीत हो गए, परंतु शिवराम के मुख पर अद्भुत शांति थी। कहते हैं, सर्प स्वयं उतरकर चला गया। इस घटना ने गांव वालों को उनके असाधारण व्यक्तित्व का संकेत दे दिया।

एक अन्य कथा में कहा जाता है कि वे गायों को चराने ले जाते, किंतु लौटते समय सब गायें स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट हो जातीं। उनके चरवाहे साथी भी चकित होते कि इतनी देर ध्यान में रहने के बाद भी कैसे सब गायें चरकर तृप्त हो जाती हैं।

✦ किशोरावस्था और वैराग्य 

जैसे-जैसे वे किशोर हुए, उनका ध्यान धर्मशास्त्रों, उपनिषदों और वेदांत पर बढ़ा। उनके पिता नरसिंह शास्त्री ने उन्हें संस्कृत, वेद, पुराण और अन्य शास्त्रों की शिक्षा दी। शिवराम की स्मृति और ग्रहण शक्ति अद्भुत थी। वे शास्त्रार्थ में प्रवीण हो गए।

हालांकि परिवार उनकी विद्वत्ता से प्रसन्न था, परंतु शिवराम का चित्त सांसारिक सुखों में नहीं रमता था। वे अकसर समाधि जैसी मुद्रा में ध्यान करते रहते।

उनकी माता विद्यावती का स्वास्थ्य गिरने लगा। उनकी सेवा में भी शिवराम ने संन्यासी-वृत्ति दिखाई – बिना थके, बिना स्वार्थ के, पूर्ण प्रेम और करुणा से सेवा की। माता के निधन ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। पिता भी कुछ वर्षों बाद दिवंगत हुए।

इन दो मृत्यु अनुभवों ने शिवराम के मन में अनित्यत्व और मरणशीलता की भावना को दृढ़ कर दिया। उन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी कि वे अब गृहस्थ जीवन में नहीं रुकेंगे।

✦ गृहत्याग

पिता के निधन के बाद शिवराम ने संपत्ति का त्याग कर दिया। भाइयों और रिश्तेदारों को सब कुछ सौंपकर वे गृहत्यागी हो गए।

यहाँ एक प्रसंग उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि उनके परिवार ने बहुत आग्रह किया कि वे कम-से-कम विवाह कर लें। उन्होंने उत्तर दिया –

“जिस देह का कोई ठिकाना नहीं, उसे किसके साथ बाँधूँ?”

इस वाक्य ने गांव में उनकी छवि एक त्यागी और वैराग्यवान साधु के रूप में स्थापित कर दी।

✦ संन्यास दीक्षा

गृहत्याग के बाद वे दक्षिण भारत के विभिन्न मठों और तीर्थक्षेत्रों में घूमे। कहते हैं उन्होंने तुंगभद्रा, कृष्णा और गोदावरी नदी के तटों पर गहन तप किया। कई योगियों और सिद्धों से दीक्षा ली और साधना रहस्य सीखे।

विशेष रूप से वे अद्वैत वेदांत की ओर आकृष्ट हुए। एक परंपरा के अनुसार उन्होंने एक महान अद्वैत वेदान्ती गुरु से संन्यास की विधिवत दीक्षा ली और अपना नाम “त्रैलंग” या “तेलंग” (आंध्र या तेलंगाना क्षेत्र से आए होने के कारण) स्वीकार किया।

✦ कठोर तपस्या और प्रारंभिक चमत्कार

उनकी प्रारंभिक साधना का विवरण भी किंवदंती बन चुका है। कहा जाता है:

वे कई वर्षों तक केवल पानी पीकर रहे।

तपोवनों में सर्पों, बिच्छुओं से घिरे रहकर भी अडिग साधना की।

घने जंगलों में ध्यान करते समय जंगली जानवर उनके पास बैठ जाते।

उन्हें कभी किसी से भय न लगता।

✦ लोककथाओं में वर्णित एक कथा

एक प्रचलित कथा है कि एक गाँव में उन्होंने निवास किया, जहाँ भयंकर सूखा पड़ा। गांववालों ने उनसे प्रार्थना की। त्रैलंग स्वामी ने हँसकर कहा – “जाओ, तालाब में जल भरो।”

लोगों ने कहा – “तालाब सूखा पड़ा है।”

उन्होंने कहा – “मेरी झोली वहाँ डाल दो।”

लोगों ने संकोच से उनकी झोली तालाब में रखी। कुछ ही देर में पानी उस झोली से निकलकर तालाब में भर गया।

यह कथा लोकश्रद्धा में इस रूप में जीती है कि त्रैलंग स्वामी केवल तपस्वी नहीं थे, वरन् लोककल्याणकारी सिद्ध पुरुष थे।

✦ तीर्थयात्रा और साधना यात्रा

गृहत्याग के बाद वे वर्षों तक भारत के उत्तर-दक्षिण तीर्थों में घूमते रहे।

कांची, रामेश्वरम, श्रीशैलम जैसे दक्षिण के प्रमुख तीर्थ।

फिर उत्तर भारत में हरिद्वार, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ।

पुष्कर, गया, जगन्नाथपुरी।

हिमालय में कई निर्जन स्थलों पर ध्यान।

उनकी यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं थी, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की खोज थी। वे जहाँ जाते, वहां ध्यानस्थ रहते और अपनी उपस्थिति से ही लोगों को चकित कर देते।


काशी आगमन

त्रैलंग स्वामी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ उनका काशी (वाराणसी) आगमन माना जाता है।

कई परंपराओं के अनुसार वे लगभग चालीस वर्ष की अवस्था में काशी आए और शेष जीवन यहीं बिताया।

कहा जाता है कि वे अपने गुरु की आज्ञा पर उत्तर भारत की यात्रा करते हुए काशी पहुँचे थे।

वाराणसी उस समय भी भारत की आध्यात्मिक राजधानी मानी जाती थी।

वेदांत, योग, तंत्र, भक्ति—सभी परंपराएँ यहाँ फली-फूली थीं।

गंगा के घाट, संन्यासियों के मठ, वेद-विद्यालय और साधुओं की मंडलियाँ इस नगरी को एक विशेष दिव्यता प्रदान करती थीं।

त्रैलंग स्वामी ने इस नगर को अपनी साधना का स्थायी केन्द्र चुना।


✦ वाराणसी का जीवन

वाराणसी पहुँचकर उन्होंने गंगा तट को अपनी साधना भूमि बनाया।

वे प्रायः मणिकर्णिका, दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा और हनुमान घाटों पर देखे जाते।

किंतु उनका कोई निश्चित निवास स्थान नहीं था।

वे किसी कुटिया, मंदिर या मठ में नहीं टिकते थे।

उनकी साधना का स्वरूप अत्यंत अनौपचारिक था।

वे निर्वस्त्र रहते थे।

उनका शरीर भस्म से लिप्त रहता।

कई बार वे गंगा जल में कई घंटों तक समाधि की स्थिति में बैठे रहते।

लोग उन्हें “चलते फिरते भगवान शिव” मानने लगे।

वाराणसी के निवासी और तीर्थयात्री उन्हें एक जीवित तीर्थ के रूप में देखने लगे।

कहा जाता है कि उनके दर्शनों मात्र से लोगों को मानसिक शांति मिलती थी।

वे सामान्य लोगों से बहुत कम बोलते थे, किंतु कभी-कभी अद्भुत सूक्तियों में उपदेश दे देते।

✦ साधना पद्धति

त्रैलंग स्वामी अद्वैत वेदांत के सिद्ध आचार्य माने जाते थे।

उनकी साधना में तप, ध्यान और समाधि के साथ-साथ अद्वैत बोध की अंतर्दृष्टि प्रमुख थी।

वे कहते थे –

“आत्मा और परमात्मा एक हैं। भेद केवल अज्ञान का है।”

उनकी साधना पद्धति में तीन बातें प्रमुख थीं:

1️⃣ देह-संयम और इंद्रियनिग्रह

2️⃣ ध्यान और समाधि

3️⃣ वैराग्य और अपरिग्रह

उनकी दिनचर्या अत्यंत अनियमित दिखती थी, लेकिन उसमें कठोर अनुशासन छिपा था।

वे घंटों गंगा के जल में ध्यानमग्न रहते।

कई बार घाट की सीढ़ियों पर लेटे रहते, या भस्म रमाकर समाधि में डूबे रहते।

खाना कभी मिलता तो खाते, अन्यथा उपवास करते।

✦ वाराणसी की जनता में लोकप्रियता

धीरे-धीरे वाराणसी में उनकी ख्याति फैलने लगी।

ब्राह्मण विद्वान, गृहस्थ, संन्यासी, व्यापारी, गरीब–सब उनके दर्शन को आते।

वे किसी को भी भेदभाव से नहीं देखते थे।

उनके शिष्य बताते हैं कि वे अस्पृश्य माने जाने वालों को भी गले लगा लेते थे।

उनका जीवन उपदेशमूलक था।

उन्होंने कभी विधिवत प्रवचन या सभा नहीं की।

लेकिन जो भी उनके पास आता, उसे वे अत्यंत सहज भाषा में अद्वैत वेदांत समझा देते।

वे कहते थे –

“सभी तीर्थ तुम्हारे भीतर हैं। शरीर ही गंगोत्री, हरिद्वार, काशी है।”

✦ चमत्कार और लोककथाएँ

त्रैलंग स्वामी के जीवन में कई चमत्कारों की कथाएँ प्रचलित हैं।

वाराणसी में उनकी ख्याति का एक बड़ा कारण यही कथाएँ भी थीं।

हालाँकि उन्होंने कभी इन्हें प्रचारित नहीं किया, पर जनश्रुति में वे जीवित रहीं।




➤ कथा 1: जल-समाधि

सबसे प्रसिद्ध घटना उनकी जल-समाधि की है।

कहा जाता है कि वे घंटों, कभी-कभी दिनों तक गंगा के भीतर डूबे रहते और फिर सहज भाव से बाहर आते।

लोग उन्हें ढूँढने लगते और अचानक देखते कि वे गंगा की लहरों पर स्थिर भाव से खड़े हैं या तट पर ध्यानमग्न बैठे हैं।




एक बार काशी के राजा ने उन्हें परीक्षा के लिए गंगा में बाँधकर डुबा दिया।

कई घंटों बाद उन्हें निकालने पर देखा गया कि वे समाधि में तल्लीन थे, शरीर में कोई विकृति नहीं थी।

यह देखकर राजा ने क्षमा माँगी और उन्हें भगवान शिव का अवतार माना।




➤ कथा 2: विषपान प्रसंग

वाराणसी के कुछ नास्तिकों ने उनके चमत्कारों को ढकोसला कहकर उनकी परीक्षा लेने की ठानी।

उन्होंने उनके लिए विष मिला हुआ दूध भेजा।

त्रैलंग स्वामी ने मुस्कुराकर सबके सामने वह दूध पी लिया।

उन्हें कुछ नहीं हुआ।

कहते हैं, उन्होंने केवल इतना कहा –




“जहर और अमृत में भेद केवल अज्ञानी के लिए है।”




➤ कथा 3: चोरी की शिक्षा

एक बार एक चोर ने उनके पास से बर्तन चुरा लिए।

लोगों ने चोर को पकड़ा और उनके पास लाए।

स्वामी ने कहा –




“उसे क्यों मारते हो? जो भी मेरे पास है, सब उसका है।”

उन्होंने उस चोर को बर्तन ही दे दिए।

चोर उनके चरणों में गिर पड़ा और जीवनभर उनका भक्त बन गया।




➤ कथा 4: राजा के लिए चमत्कार

कहा जाता है कि एक बार काशी के राजा को उनके चमत्कारों पर संदेह हुआ।

राजा ने उन्हें बंदी बनाने का आदेश दिया।

सैनिक उन्हें बाँधकर ले जाने लगे, लेकिन रस्सियाँ अपने-आप खुल जातीं।

अंततः स्वामी स्वयं राजमहल गए और कहा –




“मुझे बाँधना है तो अपने अहंकार को बाँधो।”

राजा उनके चरणों में गिर पड़ा।




➤ कथा 5: महिला को जीवनदान

एक बार एक विधवा महिला ने गंगा में कूदकर आत्महत्या कर ली।

लोग उसका शव बाहर लाए।

त्रैलंग स्वामी वहाँ पहुँचे और बोले –

“यह सोई है।”

उन्होंने शव के सिर पर हाथ रखा।

कहते हैं महिला जीवित हो उठी।

लोगों ने इसे उनके करुणा-सिद्ध योगबल का प्रमाण माना।

✦ दर्शन और उपदेश

उनका दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित था।

वे बार-बार कहते –

“जगत मिथ्या नहीं है, जगत ब्रह्मस्वरूप है। तुम स्वयं ब्रह्म हो।”

उन्होंने कभी शास्त्रार्थ के लिए औपचारिक मंच नहीं बनाया।

किंतु विद्वानों के प्रश्नों का सरल उत्तर देते।

उनका उपदेश था –

✅ ईश्वर सब में है

✅ देह-मोह छोड़ो

✅ इंद्रिय संयम रखो

✅ अहंकार का त्याग करो

✅ सबमें एकता देखो


✦ काशी के साधु समाज में स्थान

काशी के साधु समाज में त्रैलंग स्वामी को विशेष आदर प्राप्त था।

भिन्न-भिन्न संप्रदायों के संन्यासी उन्हें गुरु मानते थे।

तांत्रिक, वैष्णव, शैव, अद्वैतवादी–सभी उनके पास समाधान पाने आते।




काशी के कई प्रमुख साधुओं ने उन्हें भगवान शिव का साक्षात अवतार कहा।

उनका निर्वस्त्र रहना और भस्म रमाना शैव परंपरा की प्राचीन नागा साधु परंपरा से जोड़ा जाता है।

लेकिन वे किसी एक संप्रदाय में सीमित नहीं थे।

✦ संक्षेप

त्रैलंग स्वामी का काशी जीवन अत्यंत सरल, लेकिन चमत्कारमय था।

उनकी कठोर तपस्या, अद्वैत वेदांत की सहज व्याख्या और लोककल्याणकारी दृष्टि ने उन्हें जनमानस में अमर बना दिया।

उनकी छवि एक जीवित मुक्त, सिद्धयोगी और महाकाल के रूप में स्थापित हो गई।


त्रैलंग स्वामी की दीर्घायु : ऐतिहासिक रहस्य या योगसिद्धि?

त्रैलंग स्वामी की आयु को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।
कुछ परंपराओं के अनुसार वे 280 वर्ष तक जीवित रहे, तो कुछ में यह संख्या 160–200 वर्ष तक मानी गई है।

यह दावा सामान्यत: आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, लेकिन उनके दीर्घजीवी होने का रहस्य योग और तप से जुड़ा हुआ माना जाता है।
योगशास्त्र के अनुसार, प्राणायाम, मौन, अल्पाहार, ब्रह्मचर्य और ध्यान से आयु सीमा बढ़ाई जा सकती है।
त्रैलंग स्वामी इन सभी साधनों के परम आचार्य थे।

उनके समकालीन लोग यह स्वीकार करते थे कि जब वे काशी आए, तब भी उनकी आयु 40–50 वर्ष से ऊपर थी।
और वे कम-से-कम 100 वर्षों तक वहां रहे।
अतः यह तो स्पष्ट है कि वे एक दीर्घजीवी योगी अवश्य थे, भले ही 280 वर्ष की आयु पर ऐतिहासिक पुष्टि न हो सके।
✦ अन्य संतों से संपर्क

त्रैलंग स्वामी के समकालीन भारत में अनेक संत, महायोगी और धार्मिक सुधारक सक्रिय थे।
उनमें रामकृष्ण परमहंस, भीमाशंकर भट्ट, स्वामी विवेकानंद और तैलंग मठ के ब्रह्मचारी उल्लेखनीय हैं।
➤ रामकृष्ण परमहंस से भेंट

त्रैलंग स्वामी और रामकृष्ण परमहंस की भेंट भारतीय संत-साहित्य में अत्यंत श्रद्धा से वर्णित होती है।

कथानुसार, जब रामकृष्ण परमहंस काशी यात्रा पर आए, तब वे विशेष आग्रह से त्रैलंग स्वामी के दर्शन हेतु गंगा घाट पहुँचे।
त्रैलंग स्वामी उस समय समाधि में लीन थे।
रामकृष्ण उन्हें देखकर अभिभूत हो गए और उन्हें “चलती-फिरती शिवमूर्ति” कहा।

यह भेंट एक भावानात्मक मौन संवाद बन गई।
दोनों योगियों के बीच कुछ विशेष शब्दों का आदान-प्रदान नहीं हुआ, परंतु दोनों ने एक-दूसरे की अनुभूति में ईश्वर के पूर्णत्व का अनुभव किया।

रामकृष्ण ने बाद में अपने शिष्यों से कहा –

“त्रैलंग स्वामी केवल संत नहीं, शिव के पूर्ण अवतार हैं। उनका शरीर ही साधना है।”
✦ प्रमुख शिष्य और परंपरा

यद्यपि त्रैलंग स्वामी ने कोई औपचारिक संस्था या संप्रदाय स्थापित नहीं किया, फिर भी कुछ शिष्य उनके सान्निध्य में तप करते रहे।
इनमें प्रमुख हैं:

शिवानंद सरस्वती – जो बाद में काशी में ही तैलंग आश्रम के प्रमुख बने।


रामलाल बाबा – एक गृहस्थ भक्त, जो उनके अनुभवों को लिपिबद्ध करने का प्रयास करते रहे।


सदाशिव ब्रह्मचारी – जो उन्हें "निष्कलंक योगी" कहते थे और योगशास्त्र की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे।

उनके उपदेश वाणी से कम, आचरण और मौन से अधिक मिलते थे।
अतः उनका “शिष्यत्व” भी शास्त्रीय रूप में नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव के माध्यम से होता था।
✦ समाधि और महाप्रयाण

त्रैलंग स्वामी का महाप्रयाण 1887 ईस्वी (कुछ परंपराओं में 1881) में माना जाता है।
उस समय उनकी आयु कम-से-कम 150 वर्ष से अधिक बताई जाती है।

कहा जाता है कि उन्होंने अपने शिष्यों को पूर्व संकेत दे दिया था कि वे अब इस भौतिक देह का त्याग करेंगे।
वे शांत भाव से गंगा तट पर आए, ध्यानस्थ मुद्रा में बैठ गए और धीरे-धीरे समाधिस्थ हो गए।

लोगों ने देखा, उनका शरीर धीरे-धीरे स्थिर हो गया, पर चेहरे पर वही दिव्य तेज और मुस्कान बनी रही।
यह दृश्य हजारों लोगों के लिए भावविभोर करने वाला था।

उनकी समाधि स्थली काशी के पंचगंगा घाट के समीप स्थित है।
वर्तमान में वहां एक मंदिर और आश्रम निर्मित है, जहाँ श्रद्धालु आज भी जाकर उनका स्मरण करते हैं।
✦ त्रैलंग स्वामी की शिक्षाओं का प्रभाव

त्रैलंग स्वामी ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा।
उन्होंने उपदेश भी बहुत कम दिए।
परंतु उनका जीवन स्वयं ही एक जीवित वेदांत था।

उनकी शिक्षाएँ संक्षेप में इस प्रकार हैं:


अद्वैत का जीवनानुभव – “तुम ईश्वर से अलग नहीं हो। ईश्वर तुम्हारे भीतर है।”


इंद्रिय संयम और तप – “सुख को नहीं, सत्य को खोजो।”


कर्म से वैराग्य नहीं, करुणा उपजाओ।


सबमें शिव देखो। किसी से घृणा मत करो।


दया, क्षमा और मौन – यही श्रेष्ठ साधना है।

उनकी शिक्षाओं ने भारत में एक नई आध्यात्मिक दृष्टि दी, जहाँ साधना का अर्थ केवल गुफा में बैठना नहीं, बल्कि समाज के बीच दिव्यता को जगाना है।
✦ आधुनिक स्मृति और विरासत

त्रैलंग स्वामी की स्मृति आज भी काशी के आध्यात्मिक हृदय में जीवित है।
पंचगंगा घाट स्थित तैलंग स्वामी आश्रम एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ प्रतिवर्ष उनके निर्वाण दिवस पर समारोह होते हैं।

भारत भर के योगी, सन्यासी, साधक उन्हें अपना पूर्वज मानते हैं।
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में उनके भक्त समूह सक्रिय हैं।

उन्हें भारतीय योग परंपरा में नागा योगियों, अद्वैताचार्यों और परमहंसों की परंपरा का महासिंधु माना जाता है।

कुछ आधुनिक लेखक उन्हें “भारतीय ईसामसीह” की संज्ञा देते हैं – क्योंकि वे भी मौन, क्षमा, निर्वसनता और करुणा के प्रतीक थे। 

त्रैलंग स्वामी केवल एक साधु नहीं, बल्कि भारत की जीवित साधना परंपरा के सारस्वत प्रतीक थे।
उनका जीवन दर्शाता है कि योग केवल अभ्यास नहीं, जीवन की पूर्ण कला है।

उन्होंने सिद्ध किया कि ब्रह्मज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि व्यवहार, मौन और प्रेम से भी प्राप्त किया जा सकता है।
उनकी दीर्घायु, चमत्कार, समाधि और लोकसेवा का संगम उन्हें आधुनिक युग के एक जीवित वेदांताचार्य के रूप में स्थापित करता है।

उनकी वाणी में जीवन की अंतिम दिशा सन्निहित है:


“जो कुछ तुम बाहर खोजते हो, वही भीतर है।
भीतर झाँको – वही शिव, वही सत्य, वही मुक्ति है।”

Jun 23, 2025

5 का महत्व – भारतीय संस्कृति में पंच का रहस्य

 भारत की सनातन परंपरा में संख्याओं का विशेष महत्व है। इनमें संख्या 5 (पंच) का स्थान अत्यंत विशेष है। पाँच न केवल एक संख्या है, बल्कि जीवन, प्रकृति और धर्म का संतुलन है। चाहे वह शरीर हो, पूजा पद्धति हो या ब्रह्मांड की संरचना — हर जगह ‘पंच’ की झलक मिलती है।


इस लेख में हम जानेंगे “5 का महत्व” भारतीय परंपरा और जीवन के विभिन्न पहलुओं में।


🌿 पंचतत्व – जीवन के पाँच आधार

जीवित शरीर इन्हीं पंचतत्वों से बना है:


पृथ्वी – स्थिरता व आधार


जल – शुद्धता व प्रवाह


अग्नि – ऊर्जा व तेज


वायु – प्राणवायु व गति


आकाश – चेतना व विस्तार

Mar 25, 2025

व्रत एवं पूजन विधि - करवा चौथ व्रत विधि


करवा चौथ

उत्तर-पूर्वी भारत में प्रशिद्ध करवा चौथ के व्रत वैवाहित स्त्रियों में प्रशिद्ध है| यह व्रत निर्जला ही किया जाता है। इस दिन समस्त स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए भगवान शिव और गौरी की आराधना करतीं है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है। भारत के कई स्थानों पर इस पर्व को करवा के नाम से भी जाना जाता है|

करवा चौथ व्रत विधि


श्री करक चतुर्थी का यह व्रत करवा चौथ के नाम से प्रसिद्ध है। पंजाब , उतरप्रदेश , मध्यप्रदेश और राजस्थान का प्रमुख पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने पति के रक्षार्थ इस व्रत को रखती है। गोधुली की वेला यानी चंद्रयोदय के एक घंटे पूर्व श्री गणपति एवं अम्बिका गोर, श्री नन्दीश्र्वर, श्री कार्तिकेयजी , श्री शिवजी फ्रदेवी माँ पार्वतीजी के प्रतिप , प्रधान देवी श्री अम्बिका पार्वतीजी और

केदारनाथ यात्रा: आस्था, रहस्य और प्रकृति का दिव्य संगम

उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर स्थित है, जो भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यह मंदिर तीन ओर से केदारनाथ, खर्चकुंड और भरतकुंड पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसके अतिरिक्त, यहां मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी नामक पांच नदियों का संगम भी है, जिनमें से वर्तमान में केवल अलकनंदा और मंदाकिनी ही बह रही हैं। सर्दियों के मौसम में मंदिर पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है, इस दौरान इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं और बैशाखी के बाद इन्हें खोला जाता है।

केदारनाथ का इतिहास

हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से दो, केदारनाथ और बद्रीनाथ, उत्तराखंड राज्य में स्थित हैं। प्राचीन धार्मिक कथाओं के अनुसार, हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें दर्शन दिए। इसके साथ ही, नर और नारायण के अनुरोध पर भगवान शिव ने वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने का आशीर्वाद भी प्रदान किया। इस प्रकार, केदारनाथ और बद्रीनाथ की धार्मिक महत्ता और उनके पीछे की पौराणिक कथाएँ हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखती हैं।

Mar 22, 2025

काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ीं ये 5 बातें शायद ही जानते होंगे आप

वाराणसी में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर की महिमा विश्व प्रसिद्ध है. यह मंदिर गंगा नदी के तट पर विद्यमान है. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने निर्वाचन क्षेत्र काशी के दौरे पर थे और उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा की. यहां पहुंचकर प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरी बार पीएम पद की शपथ लेने से पहले श्रीकाशी विश्वनाथ से राष्ट्र में शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगा.

ऐसे में आइए जानते हैं विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी ऐसी 5 बातें जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं.

Mar 10, 2025

हनुमान चालीसा अर्थ सहित (Hanuman Chalisa with Meaning)





दोहा 

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

Shree Guru Charan Saroj Raj, Nij Man Mukar Sudhari,
Barnau Raghuvar Bimal Jasu, Jo dayaku Phal Chari

Budhi heen Tanu Janike, Sumirow, Pavan Kumar,
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Bikaar

अर्थ

श्री गुरु के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।

हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं। आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुखों व दोषों का नाश कार दीजिए।

With the dust of Guru's Lotus feet, I clean the mirror of my mind and then narrate the sacred glory of Sri Ram Chandra, The Supereme among the Raghu dynasty. The giver of the four attainments of life.

Knowing myself to be ignorent, I urge you, O Hanuman, The son of Pavan! O Lord! kindly Bestow on me strength, wisdom and knowledge, removing all my miseries and blemishes.

Feb 28, 2025

जाने ईश्वर प्राप्ति के कितने मार्ग है (Know How many ways are there to attain God)

ईश्वर की प्राप्ति के लिए अनेक मार्ग उपलब्ध हैं, जिन्हें विभिन्न धार्मिक परंपराओं और दार्शनिक विचारों में भिन्न-भिन्न रूप से प्रस्तुत किया गया है। हिन्दू धर्म में मुख्यतः चार प्रमुख मार्गों को मान्यता दी गई है:

भक्ति मार्ग (Devotion Path): यह मार्ग ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम को केंद्रित करता है। भक्ति मार्ग एक आध्यात्मिक पथ है जो ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम के माध्यम से जोड़ता है। इसमें व्यक्ति भगवान की पूजा, भजन, मंत्र जाप, और अन्य धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से ईश्वर के साथ अपनी आत्मा का मिलन करता है। इस मार्ग का मुख्य उद्देश्य ईश्वर के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करना है, जिसमें व्यक्ति अपनी आत्मा को ईश्वर के साथ एकत्व में लाने का प्रयास करता है।

Oct 28, 2024

दीपावली पूजन विधि

दीपावली पूजन विधि

दीपावली धन और समृद्धि का त्यौहार हैं, जिसे आमतौर पर दीवाली भी कहा जाता है, हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है जो भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों को सजाकर रंग बिरंगे बत्तियों और दीपों से सजाते हैं। दीपावली पूजन में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाज होते हैं। यहां कुछ सामान्य पूजन विधियाँ दी जा रही हैं:

इस त्यौहार में गणेश  भगवान और माता लक्ष्मी के साथ ही साथ धनाधिपति भगवान कुबेर, सरस्वती और काली माता की भी पूजा की जाती है। सरस्वती और काली भी माता लक्ष्मी के ही सात्विक और तामसिक रूप हैं।  जब सरस्वती, लक्ष्मी और काली एक होती हैं तब महा लक्ष्मी बन जाती हैं।
दीपावली की रात गणेश भगवान  और  माता लक्ष्मी की पुजा की जाती है।  गणेश जी की पूजा से सद्बुद्धि और ज्ञान मिलता है जिससे व्यक्ति में धन कमाने की प्रेरणा आती है. व्यक्ति मे इस बात की भी समझ बढ़ती है कि धन का सदुपयोग किस प्रकार करना चाहिए. माता लक्ष्मी अपनी पूजा से प्रसन्न होकर धन का वरदान देती हैं और धनधपति कुबेर धन संग्रह में सहायक होते हैं. इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही दीपावली की रात गणेश लक्ष्मी के साथ कुबेर की भी पूजा की जाती है।

पूजन सामग्री - 

कलावा, रोली, सिंदूर, १ नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), फल, बताशे, मिठाइयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी , अगर बत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रूई, आरती की थाली. कुश, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन।

पर्वोपचार - 

पूजन शुरू करने से पूर्व चौकी को धोकर उस पर रंगोली बनाएं. चौकी के चारों कोने पर चार दीपक जलाएं. जिस स्थान पर गणेश एवं लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करनी हो वहां कुछ चावल रखें. इस स्थान पर क्रमशः: गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति को रखें. अगर कुबेर, सरस्वती एवं काली माता की मूर्ति हो तो उसे भी रखें।  लक्ष्मी माता की पूर्ण प्रसन्नता हेतु भगवान विष्णु की मूर्ति लक्ष्मी माता के बायीं ओर रखकर पूजा करनी चाहिए।

आसन बिछाकर गणपति एवं लक्ष्मी की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं।  इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें

 "ऊं अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥" 

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें – 

ऊं केशवाय नम: ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-

ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए. अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें 

चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा।


दीपावली पूजन हेतु संकल्प 

पंचोपचार करने बाद संकल्प करना  चाहिए। संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें :

ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:,  ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो ऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे,  अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते :. .... .., तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) शुक्र वासरे स्वाति नक्षत्रे प्रीति योग नाग करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये.


गणपति पूजन 

किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है. इसलिए आपको भी सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा करनी चाहिए।  हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें. 

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

आवाहन: ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर पात्र में अक्षत छोड़ें. अर्घा में जल लेकर बोलें एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:. रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं. इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं "इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:दर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं. गणेश जी को वस्त्र पहनाएं. इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि.

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:. मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें. इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:. इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:. अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:

इसी प्रकार से अन्य सभी देवताओं की पूजा करें. जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश के स्थान पर उस देवता का नाम लें.

कलश पूजन -

घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें. कलश के गले में मोली लपेटें. नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें. हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आह्वान करें. 

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। 

(अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि,ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण देवता की पूजा करें. इसके बाद देवराज इन्द्र फिर कुबेर की पूजा करें.

लक्ष्मी पूजन 

सबसे पहले माता लक्ष्मी का ध्यान करें

ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

इसके बाद लक्ष्मी देवी की प्रतिष्ठा करें. हाथ में अक्षत लेकर बोलें

“ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं: 

ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। 

इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। 

इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। 

ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं.

 अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं.

लक्ष्मी देवी की अंग पूजा 

बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें—

ऊं चपलायै नम: पादौ पूजयामि ऊं चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ऊं कमलायै नम: कटि पूजयामि, ऊं कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ऊं जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ऊं विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ऊं कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ऊं कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ऊं श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा 

अंग पूजन की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें. 

ऊं अणिम्ने नम:, ओं महिम्ने नम:, ऊं गरिम्णे नम:, ओं लघिम्ने नम:, ऊं प्राप्त्यै नम: ऊं प्राकाम्यै नम:, ऊं ईशितायै नम: ओं वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी पूजन 

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें. 

ऊं आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ओं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ओं अमृत लक्ष्म्यै नम:, ऊं लक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्य लक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम:, ऊं योग लक्ष्म्यै नम:

नैवैद्य अर्पण 

पूजन के पश्चात देवी को "इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि" मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें. 

मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: "इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि" बालें. 

प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें. इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:. 

इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि

अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:.

लक्ष्मी देवी की पूजा के बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी पूजा करनी चाहिए। फिर गल्ले की पूजा करें.

पूजन के पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करें।


आरती

गणेश  भगवान की आरती 

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता  जाकी पार्वती, पिता महादेव।।

एकदंत, दयावन्त, चार भुजा धारी, माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी। 

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा, लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महा देवा।।

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया। 
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।। 

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता  जाकी पार्वती, पिता महादेव।।

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महा देवा

 माता लक्ष्मी  की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निस दिन सेवत हर-विष्णु-धाता॥ 

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता। 
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

क्षमा प्रार्थना 

न मंत्रं नोयंत्रं तदपिच नजाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपिच नजाने स्तुतिकथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपिच नजाने विलपनं
परं जाने मातस्त्व दनुसरणं क्लेशहरणं

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्याच्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षंतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोहं तव सुतः ।
मदीयो7यंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति

परित्यक्तादेवा विविध सेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि
इदानींचेन्मातः तव यदि कृपा
नापि भविता निरालंबो लंबोदर जननि कं यामि शरणं

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ

चिताभस्म लेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कंठे भुजगपतहारी पशुपतिः
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदं

न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः
अतस्त्वां सुयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाधे
धत्से कृपामुचितमंब परं तवैव

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्छदत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरंति

जगदंब विचित्रमत्र किं
परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि
अपराधपरंपरावृतं नहि माता
समुपेक्षते सुतं

मत्समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा नहि
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथायोग्यं तथा कुरु

क्षमा प्रार्थना (हिन्दी में)

परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात-दिन सहस्त्रों अपराध होते रहते है. 'यह मेरा दास है' यों समझकर मेरे उन अपराधो को तुम कृपापूर्वक क्षमा करो. 

परमेश्वरी , मै आह्वान नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा करने का ढंग भी नहीं जानता , माँ मुझे क्षमा करे.

 देवि सुरेश्वरी! मैंने जो मन्त्रहीन , क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है, वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो. 

सैंकड़ो अपराध करके भी जो तुम्हारी शरण में जा 'जगदम्ब' कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रेह्मादी देवताओं के लीये भी सुलभ नहीं है.

 जगदम्बिके! मै अपराधी हु. किन्तु तुम्हारी शरण में आया हु. इस समय दया का पात्र हु. तुम जैसा चाहो, करो... 

देवि! परमेश्वरी! अज्ञान से , भूल से अथवा बुद्धि भ्रांत होने के कारण मैंने जो न्यूनता या अधिकता कर दी हो, वह सब क्षमा करो और प्रसन्न होवो .

 सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरी! जगन्माता कामेश्वरी! तुम प्रेमपूर्वक मेरी यह पूजा स्वीकार करो और मुझ पर प्रसन्न रहो.

 देवि सुरेश्वरी! तुम गोपनीय से भी गोपनीय वास्तु की रक्षा करनेवाली हो.. मेरे निवेदन किये हुए इस जप को ग्रहण करो. तुम्हारी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो माँ. 


जय माता दी जी. माँ सब का कल्याण करो.